इस मंच के माध्यम से मैं, अपने जीवन में घटित हुए छोटे-बड़े अनुभवों और सीख दे जाने वाले लम्हो का साँझा कविता और लघु कहानियो के द्वारा करने की कोशिश कर रहा हूँ, उम्मीद है, आपको पसंद आएंगे...सुधीर श्रीवास्तव
Thursday, August 13, 2020
नमस्कार मित्रो, मेरा नाम सुधीर श्रीवास्तव है, मैं प्रयागराज निवासी हूँ और यूपी रोडवेज में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्य रत हूँ| अपने 59 साल के जीवन काल में, सभी के तरह मैंने भी बहुत से उतार चढ़ाव देखे है और सभी लम्हो से कुछ न कुछ सीखने की कोशिश की है, अब जीवन के इस पड़ाव में, मैं अपने उन लम्हों का साँझा कविता तथा कहानियो के माध्यम से इस मंच पे करने का प्रयास कर हूँ, उम्मीद है, आपको पसंद आएगी|
Friday, June 5, 2020
दिन बीतते गये आज के जमाने में दो बहुएं सास-ससुर के साथ एक साथ प्यार से रह जायें आश्चर्य जनक है न? संतोष जी की बहुएं भी जमाने से अलग नहीं हैं, सो दोनों में किसी न किसी बात पर खटपट होती रहती है। कभी एक बहू अपने कमरे को धोती तो पानी बहकर दूसरे के कमरे में आ जाता है तब दोनों बहुओं में कहा-सुनी हो जाती है।कभी एक बहू का बच्चा दूसरी बहू के कमरे में गन्दा कर देता है तो दोनों बहुओं में खटपट हो जाती है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों पर दोनो बहुएं प्रायः लड़ने लगतीं हैं। धीरे-धीरे उनमें बोलचाल बन्द हो गयी। दोनों को शिकायत रहती है कि, "माँ जी, मेरे पक्ष में कुछ नहीं बोलतीं। "इसी शिकायत के चलते दोनों ने संतोष जी की पत्नी से बोलना छोड़ दिया। खटपट यहाँ तक पहुंच गयी कि दोनो लड़कों ने आपस में बोलना छोड़ दिया, फिर बात बढ़ी तो दोनों ने अलग अलग चूल्हे जला लिए।संतोष जी और उनकी पत्नी ने दोनों लड़कों तथा बहुओं को खूब समझता लेकिन उनके समझ में कुछ न आया।दोनों लड़कों में तय हुआ कि माँ बड़े के साथ खायेगी और संतोष जी छोटे के साथ, संतोष जी ने सुना तो पत्नी से बोले,"हमने तो दोनों को कभी बाँटा नहीं फिर उन्होंने हम दोनों को क्यों बाँट लिया, नहीं हम दोनों नहीं बँटेंगे, अपना भोजन खुद बनायेंगे।"
इस तरह एक ही छत के नीचे एक परिवार तीन परिवारों में बँट गया। होली का त्यौहार आने वाला है सभी खरीदारी करने में लगे हुए हैं। संतोष जी के लड़कों ने अन्य सामानों के साथ-साथ कमरों के दरवाजे तथा खिड़कियों के लिए मोटे लम्बे और खूबसूरत परदे खरीदे। संतोष जी ने परदों को देखा तो उनकी खूब तारीफ की और अन्त में बोले, "इनसे अच्छे नजर ,जुबान और प्रेम के परदे होते हैं जिनके आगे सब परदे बेकार हैं।"
सुनकर दोनों लड़के तथा उनकी पत्नियां एक-दूसरे को देखने लगे जबकि संतोष जी की आवाज में एक दर्द छुपा हुआ था।
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आप ठहरे देवता और जमाना दूसरे मिजाज का है।"
राम लाल जी रिटायर हो गए।मनोज की भी शादी हो गयी।
किन्तु उसकी पत्नी तेज निकली।राम लाल जी पत्नी से उसकी नहीं बनती थी।सो पत्नी के कारण वह माँ-बाप को अपने पास न रख सका।अतः राम लाल जी ने रिटायरमेन्ट के बाद ऑफिस से मिले पैसों से एक छोटा सा मकान बनवा लिया।जिन्दगी शान्ति से गुजर रही थी कि राम लाल जी की पत्नी का देहांत हो गया।राम लाल जी अकेले पड़ गये।मनोज के पास रहने लगे तो मनोज की पत्नी को राम लाल जी और अपने बच्चों को संभालना भारी हो गया।इसलिए राम लाल सुनीता के पास रहने लगे।लेकिन कितने दिन रहते?सुनीता के पति और ससुराल वालों को खटकने लगे अतः अब बेचारे अकेले ही रहतें हैं।भोजन-पानी के लिए एक नौकर लगा रखा है।
नमस्कार मित्रो, मेरा नाम सुधीर श्रीवास्तव है, मैं प्रयागराज निवासी हूँ और यूपी रोडवेज में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्य रत हूँ| अपने 59 साल के जीवन काल में, सभी के तरह मैंने भी बहुत से उतार चढ़ाव देखे है और सभी लम्हो से कुछ न कुछ सीखने की कोशिश की है, अब जीवन के इस पड़ाव में, मैं अपने उन लम्हों का साँझा कविता तथा कहानियो के माध्यम से इस मंच पे करने का प्रयास कर हूँ, उम्मीद है, आपको पसंद आएगी|
Wednesday, January 29, 2020
पिता
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राम लाल जी सरकारी मुलाजिम थे।दुनिया की छल-कपट और लल्लो-चप्पो से दूर एक सीधे-सादे इंसान।पत्नी और दो बच्चों,एक लड़का मनोज तथा लड़की सुनीता, के साथ रहते हैं।ऊपरी कमाई की कुर्सी पर बैठ कर भी ईमानदारी से नौकरी की।कभी अपनी नीयत नहीं खराब की पैसे के प्रति।इसलिए कार्यालय में अधिकारियों तथा कर्मचारियों में अच्छी छवि के बावजूद उन्नति न कर सके।क्योंकि इसके लिए तेज-तर्रार चलता-फिरता होना आवश्यक था जबकि राम लाल जी ठहरे एक सीधे-सादे आदमी अपने काम से काम रखने वाले आदमी।
बैंक से लोन लेकर मनोज को एमबीबीएस करवाया।पैसे तो सुनीता की शादी के लिए रखे हुए थे सो सुनीता की शादी अपने दम पर की।मनोज डाॅक्टर बन गया।उन्हें तथा उनकी पत्नी को बड़ा गर्व होता जब मनोज कहता,"पापा-मम्मी रिटायरमेन्ट बाद आप लोग मेरे पास रहियेगा।पापा यह जमाना आप जैसों के लिए नहीं है।आप ठहरे देवता और जमाना दूसरे मिजाज का है।"
राम लाल जी रिटायर हो गए।मनोज की भी शादी हो गयी।
किन्तु उसकी पत्नी तेज निकली।राम लाल जी पत्नी से उसकी नहीं बनती थी।सो पत्नी के कारण वह माँ-बाप को अपने पास न रख सका।अतः राम लाल जी ने रिटायरमेन्ट के बाद ऑफिस से मिले पैसों से एक छोटा सा मकान बनवा लिया।जिन्दगी शान्ति से गुजर रही थी कि राम लाल जी की पत्नी का देहांत हो गया।राम लाल जी अकेले पड़ गये।मनोज के पास रहने लगे तो मनोज की पत्नी को राम लाल जी और अपने बच्चों को संभालना भारी हो गया।इसलिए राम लाल सुनीता के पास रहने लगे।लेकिन कितने दिन रहते?सुनीता के पति और ससुराल वालों को खटकने लगे अतः अब बेचारे अकेले ही रहतें हैं।भोजन-पानी के लिए एक नौकर लगा रखा है।
Lauchora
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राम लाल जी सरकारी मुलाजिम थे।दुनिया की छल-कपट और लल्लो-चप्पो से दूर एक सीधे-सादे इंसान।पत्नी और दो बच्चों,एक लड़का मनोज तथा लड़की सुनीता, के साथ रहते हैं।ऊपरी कमाई की कुर्सी पर बैठ कर भी ईमानदारी से नौकरी की।कभी अपनी नीयत नहीं खराब की पैसे के प्रति।इसलिए कार्यालय में अधिकारियों तथा कर्मचारियों में अच्छी छवि के बावजूद उन्नति न कर सके।क्योंकि इसके लिए तेज-तर्रार चलता-फिरता होना आवश्यक था जबकि राम लाल जी ठहरे एक सीधे-सादे आदमी अपने काम से काम रखने वाले आदमी।
बैंक से लोन लेकर मनोज को एमबीबीएस करवाया।पैसे तो सुनीता की शादी के लिए रखे हुए थे सो सुनीता की शादी अपने दम पर की।मनोज डाॅक्टर बन गया।उन्हें तथा उनकी पत्नी को बड़ा गर्व होता जब मनोज कहता,"पापा-मम्मी रिटायरमेन्ट बाद आप लोग मेरे पास रहियेगा।पापा यह जमाना आप जैसों के लिए नहीं है।आप ठहरे देवता और जमाना दूसरे मिजाज का है।"
राम लाल जी रिटायर हो गए।मनोज की भी शादी हो गयी।
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बड़ा कौन --------------- राम बाबू और श्याम बाबू दोनों भाइयों में बहुत घनिष्ठता थी, घनिष्ठता होती भी क्यों न? दोनों बहुत बड़े व्यापार...