Wednesday, August 7, 2019

कविता

पचास पार दम्पति
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पागलपन भी कैसा है यह,
तुम बिन हम नहीं सकते,
जीवन में संघर्ष किया है,
तुम बिन हम कैसे रहेंगे?
जब जवां हम दोनो थे,
वह समय भी याद है हमको,
संघर्षरत हम दोनो थे,
अब तो तुम्हारा प्यार मिला है।
यह उम्र भी कितनी अजीब है,
जवानी का संघर्ष बिताकर,
फुर्सत से फिर हम दोनो हैं,
उड़ने का मन फिर होता है,
गर तुम साथ रहो तो।
अहोभाग्य मेरा है यह तो,
तुम अब भी मेरे साथ खड़े हो,
साथ जियें हैं साथ मरेंगे,
बस यही अन्तिम इच्छा है हमारी।।

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