Friday, August 23, 2019

शक

शक
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Doubt in relationship

मेरे एक परिचित हैं रघुनाथ प्रसाद जी, दूसरे ऑफिस में काम करते हैं। उनकी अपने सहकर्मी इन्द्रजीत से बहुत अच्छी दोस्ती थी, साथ ही खाते साथ ही पीते, घर से बाहर वे अधिकांशतः साथ ही दिखते थे, सुख हो या दुःख एक-दूसरे के हर मौके पर एक पैर खड़े रहते थे। पारिवारिक सम्बन्ध थे दोनों में।कोई पर्दा नहीं था चाहे बहू हो, बेटी हो या पत्नी हो, हम लोग उनकी घनिष्ठता का मिसाल देतें थे।
एक बार रघुनाथ जी की लड़की की शादी पड़ी, इन्द्रजीत तन-मन-धन से उनके साथ लगे रहे। वही नहीं, उनका परिवार भी लगा रहा। यहाँ तक कि यूं समझा जाये कि रघुनाथ जी ने शादी की आधी से अधिक जिम्मेदारी इस परिवार को दे रखी थी। यह परिवार भी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रहा था चाहे इन्द्रजीत हों या उनकी पत्नी या बच्चे सभी जी-जान से लगे थे। पूरा समाज इन्द्रजीत और उनके परिवार की वाह वाही कर रहा था। तारीफों के पुल बाँध रहा था। अपनी जिम्मेदारियों के अलावा भी इन्द्रजीत का परिवार जहाँ कोई कमी देखता उसे दूर करने के लिए खुद ही बिना कहे लग जाता जैसे अपनी बेटी-बहन की शादी हो।
शादी के छह महीने बाद इन्द्रजीत अचानक काफी बीमार पड़ गये। अब रघुनाथ जी बारी थी। ऑफिस से छुट्टी ले ली, इन्द्रजीत की सेवा में लग गये। कई रात अस्पताल में ही रूक गये। डॉक्टर को जो भी जरूरत पड़ती खुद निःस्वार्थ भाव से पूरी करते। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। लाख प्रयास के बाद भी इन्द्रजीत नहीं बचे। उनके परिवार पर पहाड़ गिर पड़ा।
रघुनाथ जी ने तो जैसे सगा भाई ही खो दिया, इन्द्रजीत के परिवार का भी बोझ रघुनाथ जी के ऊपर आ गया। उस परिवार को भी समय देने लगे। दिन भर में दो-तीन बार उस परिवार का हाल लेने जाने लगे।
रघुनाथ जी पत्नी को यह न सुहाता, इसी बीच इन्द्रजीत का लड़का इंजीनियरिंग करने लगा। रघुनाथ जी की पत्नी को शक हो गया कि, "हो न हो, रघुनाथ जी ही उसे पढ़ा रहें हैं।" हालांकि कि इन्द्रजीत की पत्नी मृतक कोटे में नौकरी पा चुकी थी। लेकिन पत्नी के शक का इलाज रघुनाथ नहीं कर सके। पत्नी से रोज ही झगड़ा होने लगा।
इन्द्रजीत का लड़का इंजीनियर बन गया तो उसने बहुत अच्छा सा मकान बनवा लिया। रघुनाथ की पत्नी ने शक किया कि जरूर उसके पति की मदद से बना है। निश्चित रूप से इन्द्रजीत की पत्नी और रघुनाथ के सम्बन्ध सीमा पार गये हैं। यह शक इतना गहरा होता गया कि एक दिन पत्नी ने रघुनाथ से खूब झगड़ा किया।रघुनाथ सफाई देते रहे लेकिन वह न मानी बोली, "आज से तुमको आजाद करती हूॅ, जाओ उस कुलटा के साथ मौज करो।"
इतना बड़ा और भद्दा आरोप रघुनाथ नहीं सह पाये। पत्नी को तमाचा मार दिया। पत्नी को भी गुस्सा आ गया।दूसरे कमरे में जाकर दरवाजा बन्द कर लिया। रघुनाथ डरे कहीं ऐसा-वैसा न कर बैठे। पड़ोसियों की मदद से दरवाजा तोड़कर अन्दर घुसे तो पत्नी को फाँसी का फंदा तैयार करते देखा। हाथ-पैर जोड़कर उसे रोका-मनाया।आइंदा इन्द्रजीत के घर कदम न रखने की कसमें खाई। तब जाकर पत्नी शान्त हुई।
रघुनाथ जी को अब महसूस हुआ कि एक शक का ऐसा भी अंत हो सकता है।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव

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