Monday, August 19, 2019

माँ-बाप का दर्द - कविता

                         माँ-बाप का दर्द                       

                   

दिन अच्छे खासे बीत रहे थे, 
एक-दूजे को समझ रहे थे, 
फिर एक दिन ऐसा भी आया, 
हम दोनों का ब्याह हो गया।
उमंगों की डोर पर, 
हम उड़ने से लगे थे, 
कसमें और वादे रोज ही, 
खाते रहते थे।
साथ जियेंगे साथ मरेंगे, 
तुम बिन हम भी न रहेंगे, 
दिन यूं ही बीत रहे थे, 
हँसी खुशी हम दोनो थे।
साथ ही खाते साथ ही पीते, 
सुख-दुख में हम एक ही रहते, 
पत्नी जब भी मायके जाती, 
यह बिछुड़न हमको भारी लगती।
मिल जाने को एक-दूजे से, 
झूठ भी बोलते घर वालों से, 
खून-पसीना एक कर डाला, 
एक घर बना ही डाला।
रहते उसमें हम दोनों थे, 
खाते-पीते मस्त थे दोनों,
नये दो मेहमान घर में आये, 
नन्हें थे पर प्यारे थे।
हम उनमें व्यस्त हो गए, 
तिल-तिल कर वे बढ़ने लगे थे, 
पेट काटकर उन्हें पढ़ाया, 
इंजीनियर और डॉक्टर बनाया।
सोचा अब बहुएं आयेंगी, 
मेरे घर की शान बढ़ेगी, 
देख कर सुन्दर दो परियां,
दोनों की शादी कर डाली।
समय बीता कुछ अच्छा सा, 
फिर एक दिन ऐसा भी आया, 
तू-तू मैं-मैं होने लगी थी, 
दोनों बच्चें लड़ने लगे थे।
मकान जो था हमने बनाया, 
करने लगे उसका बँटवारा, 
कहते ऊपर वाला मैं ले लूंगा, 
नीचे वाला तुमको दूंगा।
हमने उनको खूब समझाया, 
पर उनके कुछ समझ न आया, 
जैसे-तैसे हो गया बँटवारा, 
यह न सोचा माँ-बाप भी रहते।
अब आयी अपनी भी बारी, 
दोनों कहते,"मैं न रखूँगा, 
तनख्वाह मेरी इतनी थोड़ी, 
मुश्किल से परिवार ही चलता।"
किसी तरह सुलह हो गई, 
बाँट लिया फिर हम दोनों को, 
एक कहता,"मैं माँ को लूंगा,"
दूजा कहता,"मैं बाप को लूंगा।"
हम दोनों ने ही तो मिलकर,
पिछले चालीस साल गुजारे,
सुनकर अपना बँटवारा, 
रूह कांप गई हम दोनों की।
बोले,"अब हम न बँटेंगे, 
साथ जियें हैं साथ मरेंगे, 
बीते दिन हम याद करेंगे, 
कैसे-कैसे दिन देंखे हैं।"
दुनिया में वे माँ-बाप धन्य हैं,
जिनकी संतानें नहीं बँटतीं,
भगवान् मेरी संतानों से तो,
अचछा था मुझको संतान न देता।

               

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