बच्चें तो बच्चें ही होते हैं
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घटना बिल्कुल सत्य है।मेरी ऑखों देखी है इसमें कुछ भी नहीं जोड़ा या घटाया नहीं गया है।मैं प्रयागराज में रहता हूॅ इसलिये कुम्भ मेला देखने का अवसर मिलता ही रहता हूॅ।इस मायने में मैं खुशकिस्मत हूॅ।वैसे यह मेला हर साल लगता है लेकिन छोटे रूप में जिसे "माघ मेला" कहतें हैं।हर बारह साल बाद पूर्ण कुम्भ लगता है।लेकिन बीच में छः साल बाद अर्द्ध कुम्भ मेला लगता है।इस मेले की अहमियत वही जान सकता है जो मेले में आया हो।हर ओर भक्ति का आलम।साधु-संतों की भीड़।विदेशी सैलानियों तथा भक्तों का जन सैलाब।केवल कल्पना ही की जा सकती है।कहते हैं समुद्र-मंथन के बाद अमृत की कुछ बूंदें यहाँ गंगा-यमुना-सरस्वती के तट पर गिर पड़ीं थीं अतः इस मेले में तीनों पवित्र नदियों के संगम में स्नान करने से सारे पाप धुल जातें हैं।एक ओर अकबर का किला है तो दूसरी ओर लेटे हुए हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है।किले में अक्षय वट है कहतें हैं पहले ऋषि-मुनि इस पर से यमुना में छलांग लगा देते थे तो सीधे स्वर्ग पहुंच जाते थे।यह बात सच है या गलत मैं नहीं जानता लेकिन ऐसी किवदंती है।
हाँ तो,
इस बार भी मैं अर्द्ध कुम्भ मेला घूम रहा था परिवार के साथ था।अचानक मेरी नजर एक आधुनिक और अप टू डेट दम्पति पर पड़ी।जिसके साथ दो बच्चें थे एक चार-पाँच साल का लड़का और एक लड़की आठ-दस साल की।लड़का दम्पति की तरह अप टू डेट था जब कि लड़की बहुत ही साधारण यहाँ तक कि हवाई चप्पल पहने थी।दम्पति लड़की से ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसे वह उनकी नौकरानी हो।एक जगह एक गुब्बारे बेंचने वाला गुब्बारा बेंच रहा था।लड़के ने जिद की तो दम्पति ने लड़की से एक ही गुब्बारा मंगवाया।लड़की गुब्बारे से खेलने लगी तो लड़के की माँ तुरन्त डपट पड़ी,"पगली गुब्बारा टिंकू के लिए मंगवाया है तेरे लिए नहीं।चल टिंकू को दे दे।दुष्ट कहीं की।"
लड़की ने गुब्बारा लड़के को दे दिया लेकिन हसरत भरी नजरों से गुब्बारे को देखते रह गई।मैंने भी अचरज से दम्पति को देखता रह गया।सोचा एक गुब्बारा लड़की के लिए भी खरीद दूं।लेकिन दम्पति बुरा न मान जाये इस डर से नहीं खरीदा।मन मसोस कर रह गया।सोचने लगा,"बच्चें तो बच्चें ही होंते हैं।फिर इतना अन्तर क्यों?"
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घटना बिल्कुल सत्य है।मेरी ऑखों देखी है इसमें कुछ भी नहीं जोड़ा या घटाया नहीं गया है।मैं प्रयागराज में रहता हूॅ इसलिये कुम्भ मेला देखने का अवसर मिलता ही रहता हूॅ।इस मायने में मैं खुशकिस्मत हूॅ।वैसे यह मेला हर साल लगता है लेकिन छोटे रूप में जिसे "माघ मेला" कहतें हैं।हर बारह साल बाद पूर्ण कुम्भ लगता है।लेकिन बीच में छः साल बाद अर्द्ध कुम्भ मेला लगता है।इस मेले की अहमियत वही जान सकता है जो मेले में आया हो।हर ओर भक्ति का आलम।साधु-संतों की भीड़।विदेशी सैलानियों तथा भक्तों का जन सैलाब।केवल कल्पना ही की जा सकती है।कहते हैं समुद्र-मंथन के बाद अमृत की कुछ बूंदें यहाँ गंगा-यमुना-सरस्वती के तट पर गिर पड़ीं थीं अतः इस मेले में तीनों पवित्र नदियों के संगम में स्नान करने से सारे पाप धुल जातें हैं।एक ओर अकबर का किला है तो दूसरी ओर लेटे हुए हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है।किले में अक्षय वट है कहतें हैं पहले ऋषि-मुनि इस पर से यमुना में छलांग लगा देते थे तो सीधे स्वर्ग पहुंच जाते थे।यह बात सच है या गलत मैं नहीं जानता लेकिन ऐसी किवदंती है।
हाँ तो,
इस बार भी मैं अर्द्ध कुम्भ मेला घूम रहा था परिवार के साथ था।अचानक मेरी नजर एक आधुनिक और अप टू डेट दम्पति पर पड़ी।जिसके साथ दो बच्चें थे एक चार-पाँच साल का लड़का और एक लड़की आठ-दस साल की।लड़का दम्पति की तरह अप टू डेट था जब कि लड़की बहुत ही साधारण यहाँ तक कि हवाई चप्पल पहने थी।दम्पति लड़की से ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसे वह उनकी नौकरानी हो।एक जगह एक गुब्बारे बेंचने वाला गुब्बारा बेंच रहा था।लड़के ने जिद की तो दम्पति ने लड़की से एक ही गुब्बारा मंगवाया।लड़की गुब्बारे से खेलने लगी तो लड़के की माँ तुरन्त डपट पड़ी,"पगली गुब्बारा टिंकू के लिए मंगवाया है तेरे लिए नहीं।चल टिंकू को दे दे।दुष्ट कहीं की।"
लड़की ने गुब्बारा लड़के को दे दिया लेकिन हसरत भरी नजरों से गुब्बारे को देखते रह गई।मैंने भी अचरज से दम्पति को देखता रह गया।सोचा एक गुब्बारा लड़की के लिए भी खरीद दूं।लेकिन दम्पति बुरा न मान जाये इस डर से नहीं खरीदा।मन मसोस कर रह गया।सोचने लगा,"बच्चें तो बच्चें ही होंते हैं।फिर इतना अन्तर क्यों?"
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