Tuesday, September 3, 2019

ममत्व

ममत्व ------------

mother love

ज्ञान प्रकाश ने अपने पिता को नहीं देखा है उसके बचपन में स्वर्ग सिधार गये थे। माँ ने पाल-पोस कर बड़ा किया। अनपढ़-गँवार है बेचारी। इसलिये दूसरों के घर बर्तन माँजती थी और घरों में झाड़ू पोछा लगाकर अपना तथा ज्ञान प्रकाश का भरण-पोषण करती थी। माँ की एक ही इच्छा थी कि ज्ञान प्रकाश को बाप की कमी न खले तथा वह पढ़-लिख कर किसी लायक बन जाये, जी तोड़ मेहनत करती थी। जैसे-जैसे ज्ञान प्रकाश बड़ा होता गया और उसकी पढ़ाई का बोझ उसकी माँ के कंधों पर बढ़ता गया माँ ने और भी घरों में काम पकड़ लिया किन्तु ज्ञान प्रकाश को किसी प्रकार की कमी नहीं होने देती थी, चाहे वह पढ़ाई में हो या कपड़ों की या फिर दोस्तों में सामंजस्य की. हर कमी पूरी करती थी। ज्ञान प्रकाश भी माँ से बहुत प्यार करता था। माँ के ही साथ खाता-पीता।जब तक माँ को सुला नहीं देता सोता नहीं था।
अब ऊपर वाला मेहरबान हुआ तो ज्ञान प्रकाश अच्छी पद की नौकरी पा गया। माँ से सारे काम छुड़वा दिया और अब खुद माँ का ध्यान रखने लगा। समय बीता ज्ञान प्रकाश की शादी एक अच्छे परिवार की लड़की से हो गयी।लड़की आधुनिक विचारों वाली थी और माँ पुराने विचारों वाली। माँ आदत के अनुसार बर्तन माँजने से लेकर घर के सारे करती थी। सीमा(ज्ञान प्रकाश की पत्नी)का विचार था कि सब कामों के लिए एक नौकरानी रख ली जाये।
ज्ञान प्रकाश से उसने कहा तो ज्ञान प्रकाश ने माँ से कहा, "माँ तुमने जिन्दगी भर दूसरे के घरों में काम करके मुझे इस लायक बना दिया है कि मैं घर के कामों के लिए एक नौकरानी तो रख ही सकता हूॅ। तुम्हारी सेवा करने का जो मौका मुझे मिला है उसे मुझसे मत छीनो।"
माँ का कलेजा दूना हो जाता लेकिन कहती, "बेटा, जब दूसरों के घर काम करते मुझे शर्म नहीं आई तो अपने घर का काम करने में क्या आयेगी?"
ज्ञान प्रकाश निरुत्तर हो जाता। उसे ऑफिस आठ बजे जाना होता था जो सीमा के उठने का समय होता था।अतः माँ ही सुबह का नाश्ता व दोपहर का लंच बनाकर उसे ऑफिस भेजती थी। कई बार उसने सीमा को समझाया लेकिन वह सुनती नहीं थी। कहती, "जरूर उस बुढ़िया ने कहा होगा, इसके पहले मैं नहीं उठ सकती थकान दूर नहीं होती।"
ज्ञान प्रकाश माँ को कष्ट न हो कि सीमा उन्हें बुढ़िया कहती है शान्त ही रह जाता।
कुछ दिनों बाद सीमा ने एक बच्चे को जन्म दिया। धीरे-धीरे वह दो साल का हो गया। सुबह से शाम तक बच्चा दादी के पास रहता। दादी बच्चे को गोविन्द कहती जो सीमा को पसंद न था। उसे आधुनिक नाम पसंद था इसलिये बच्चे को टिंकी कहती और चाहती थी यही नाम बच्चे का रखा जाये। किन्तु चूँकि बच्चा दादी से ही अधिक सटा रहता था सो गोविन्द नाम से ही लोग पुकारते। दादी बच्चे को भजन, पुराने बच्चों के गीत सुनाती, कहानी किस्से सुनाती जिन्हें सीमा पसंद नहीं करती। उसका विचार था कि इस तरह तो बच्चा  १८ वीं सदी का हो जायेगा। वह बच्चे को आधुनिक बनाना चाहती थी, सो टीवी पर नये गाने लगाकर कभी डिस्को, कभी ब्रेक, कभी टिप्स डांस सिखाती, जब कभी दादी बच्चे को कुछ सिखाती सीमा बच्चे को बुला लेती।
एक दिन ज्ञान प्रकाश ऑफिस के कामों में अधिक व्यस्त रहा। मानसिक व शारीरिक रूप से थका घर आया तो सीमा ने उससे कहा, "बुढ़िया को समझा दो. बच्चे से दूर ही रहे या फिर मुझे मेरे घर पहुंचा दो।"
एक ऑफिस की उलझन ऊपर सीमा का यह रूख ज्ञान प्रकाश को गुस्सा आ गया।सीमा से कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई तो सारा गुस्सा माँ पर उतार दिया,"माँ इस घर में रहना है तो मेरे और सीमा के अनुसार चलो नहीं तो दूसरा ठिकाना खोज लो।रोज की चिक-चिक से मैं ऊब गया हूॅ-------------‌--"
और भी क्या-क्या कह डाला गुस्से में उसे खुद याद न रहा।
माँ अपने लड़के का यह रूप देख भौंचक्का रह गई।इतना ही बोल पायी,"अब इस उम्र में किसके पास जाऊँ?"
ज्ञान प्रकाश बोला,"भाड़ में जाओ लेकिन यहाँ से जाओ।"
उस रात किसी ने खाना नहीं खाया।गुस्सा ठंडा होने पर ज्ञान प्रकाश बहुत पछताया।माँ ने उसे कैसे-कैसे पाला है याद करने लगा रात भर सो न पाया।पांच-छह बार बाथरूम गया।जब उठता माँ को करवट बदलते देखता।कई बार माँ के पास गया लेकिन वह सोने का नाटक करते हुए ऑखें बन्द कर लेती।लेकिन ऑसुओं को न छुपा पाती।वह भी ज्ञान प्रकाश की एक-एक हरकत देख रही थी।
सुबह ज्ञान प्रकाश को झपकी आने लगी।माँ उठी और उसके सर पर तेल लगाने लगी।ज्ञान प्रकाश ने ध्यान भी दिया पर बोला कुछ नहीं।बहुत दिनों बाद माँ आज सर सहला रही थी।इतना प्यारा स्पर्श पाकर माँ की गोद में सर रखकर सो गया। ।दो घण्टे बाद सोकर उठा।माँ को वैसे ही बैठे देखकर बोला,"माँ तुम हटी नहीं?"
माँ बोली,"बेटा, मैं हटती तो तुम जाग जाते।"
ज्ञान प्रकाश को प्रायश्चित होने लगा।रूऑसा होकर बोला,"माँ मैंने रात में तुम्हें न जाने क्या-क्या कह दिया माफ कर दो।"
माँ बोली,"बेटा, बहू की कोई बात नहीं।दूसरे घर से आई है।उसे मेरे साथ तथा मुझे उसके साथ तालमेल बैठाने में समय लगेगा।तुम तो मेरे शरीर से जन्मे हो।जब तुम कुछ कहते हो
तो मुझे बहुत कष्ट होता है।मैं मर्माहत हो।जाती हूॅ।"
ज्ञान प्रकाश बोला,"माँ, माफ कर दो।आइन्दा से--------------"
इसके आगे वह न बोल पाया।गला रूंध गया।ओंठ काँपने लगे।बस माँ को पकड़ कर बिलख-बिलख कर रोने लगा।उसके रोने में उसका पश्चाताप घुलने लगा।माँ भी रो रही थी उसके ऑसुओं में बेटे के प्रति ममत्व उमड़ रहा था।

अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव

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