Thursday, September 5, 2019

                            चापलूसी
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ज्वाला प्रसाद मिश्रा,
इनका नाम ही नहीं है।बल्कि दूसरों को देखकर जलना और कूढ़ना इनकी आदत में है।हैं तो बड़े बाबू लेकिन दूसरों की शिकायत अधिकारियों से करतें हैं और आजकल अधिकारी भी कान के कमजोर होतें हैं तथा चापलूसी अधिक पसंद करतें हैं इसलिए ज्वाला प्रसाद मिश्रा की चाँदी ही रहती है।इसी चापलूसी के दम पर वे इंचार्ज बन बैंठे हैं।ऐसा नहीं कि वह इस पद के लायक हैं या वरिष्ठ हैं किन्तु चापलूसी के कारण इंचार्ज हैं।अधिकारी कान के कच्चे हैं सो एक आदमी,जो पहले से काम करता आ रहा था, उसे हटाकर मिश्रा जी को सर्वेसर्वा बना दिया है।
चूँकि अधिकारी की निगाह में अच्छे हैं।अतः पैसा भी जी भर कमाते हैं।जब चाहा तब किसी को इस मेज से हटाकर उस मेज कर दिया।अब इस काम के लिए पैसा ऐंठना तो लाज़िमी ही है न।एक अच्छे -खासे व्यक्ति को अपने साथ सटाये रहतें हैं।वह बिचौलिए का कार्य करता है।मेरी भी शिकायत कई बार कर चुके हैं।अधिकारी भी इनके कहने के अनुसार ऑफिस का  कई बार मुआयना कर चुके हैं कई लेकिन हर बार बेचारे मुंह की खा जातें हैं।ज्वाला जी जब कभी भी डाँट खातें हैं तो उनका मुंह देखने लायक रहता है।कहतें हैं न,कुत्ते की दुम सीधी नहीं होती,फिर अधिकारी के कान भरना तथा दूसरों की शिकायत करना शुरू कर देंते हैं।अधिकारी कान के कच्चे फिर इनकी बातों में आ जातें हैं।
एक दिन ज्वाला प्रसाद जी शाम को घर जा रहे थे।थोड़ा सा दिमाग उलझा था उनका।चापलूस होने के बाद भी उस दिन डाँट खा गये थे।एक ट्रक से टकरा गये बेचारे।जिस आदमी को हटवा कर इंचार्ज बने थे उसी आदमी ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया।डाॅक्टर को दिखाया।कई दिनों तक अस्पताल में रहे लेकिन कोई अधिकारी देखने नहीं आया।उन्हें अब समझ में आया कि चापलूसी करके कुछ नहीं मिलता।मिलता है तो अपने व्यवहार से।

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