माँ-बाप
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माँ-बाप इन दो शब्दों में ब्रम्हांड है माँ त्याग है तो बाप अनुशासन है।बाप अनुशासन सिखाता है तो माँ त्याग।जीवन के संघर्ष में दोनों का अलग-अलग महत्व है।बाप कभी-कभी मारता है तो सन्तान के लिए वह दुश्मन स्वरुप होता है लेकिन यदि देखा जायं तो यही मार जीवन-मार्ग पर चलना सिख्ती है।बाप दुश्मन होकर भी सबसे बड़ा मित्र होता है जिसे महत्व नहीं दिया जाता है।सच मानिए बाप बच्चों को मारता है तो बच्चे से अधिक कष्ट उसे ही होता है।लेकिन क्या अजीब विडम्बना है कि बड़े होकर बच्चे दोनो को भार समझने लगतें हैं।उन्हें पिछली पीढ़ी का समझने लगतें हैं लेकिन बच्चों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे पिछली पीढ़ी के ही सही लेकिन अनुभवी होतें हैं।अतः मैं तो कहूँगा कि उनका निरादर करने के बजाय बच्चों को उनके अनुभव का फायदा उठाना चाहिए।
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माँ-बाप इन दो शब्दों में ब्रम्हांड है माँ त्याग है तो बाप अनुशासन है।बाप अनुशासन सिखाता है तो माँ त्याग।जीवन के संघर्ष में दोनों का अलग-अलग महत्व है।बाप कभी-कभी मारता है तो सन्तान के लिए वह दुश्मन स्वरुप होता है लेकिन यदि देखा जायं तो यही मार जीवन-मार्ग पर चलना सिख्ती है।बाप दुश्मन होकर भी सबसे बड़ा मित्र होता है जिसे महत्व नहीं दिया जाता है।सच मानिए बाप बच्चों को मारता है तो बच्चे से अधिक कष्ट उसे ही होता है।लेकिन क्या अजीब विडम्बना है कि बड़े होकर बच्चे दोनो को भार समझने लगतें हैं।उन्हें पिछली पीढ़ी का समझने लगतें हैं लेकिन बच्चों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे पिछली पीढ़ी के ही सही लेकिन अनुभवी होतें हैं।अतः मैं तो कहूँगा कि उनका निरादर करने के बजाय बच्चों को उनके अनुभव का फायदा उठाना चाहिए।
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