फुलवा
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मैं जब कभी फुलवा को देखता हूॅ वह अपनी बागवानी में दिखती। पौधों और फूलों में व्यस्त यही उसकी दुनिया है। किसी से अधिक न बोलती है, न कोई मतलब रखती है। छोटी सी दुनिया है उसकी। हालांकि बात आम है लेकिन जब से लोगों के मुंह से मैंने सुना है कि पहले बहुत हँस-मुख थी और सबसे प्रेम व्यवहार रखती थी लेकिन बच्चा न होने के कारण जब से उसके पति ने उसे छोड़ दिया है। वह रहस्यमयी हो गई है। शायद टोना-टोटका भी करती है। इसलिये उससे कोई बोलता भी नहीं न ही मतलब रखता है। सुनकर मेरे दिल में न जाने क्यों उसके प्रति रुचि पैदा हो गई। आज के समाज में टोना-टोटका! मैं नहीं मानता हूॅ। हालाँकि कोई यह न बता सका कि उसने कब किस पर टोना किया है। मैं एक जिज्ञासु प्रकृति का आदमी हूॅ, अतः उसकी टोना-टोटके की रहस्यमयी दुनिया को जानने की इच्छा पैदा हो गई। लेकिन पता कैसे हो? सोचने लगा।
एक दिन उसकी बागवानी में पहुंच गया। वह फूलों में व्यस्त थी, मुझपर कोई ध्यान नहीं दिया। उसका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए मैंने कहा,"सुनिये।"उसने मुझे आश्चर्य से देखा।सुन्दर थी जवान थी। मैं बोला,"पूजा के लिए एक फूल चाहिए।"
वह बोली, "मैं फूल तो किसी को देती नहीं। लेकिन चूँकि आज आप पहली बार आयें हैं, इसलिये देती हूॅ। वैसे ही यहाँ कोई नहीं आता, आपको देख कर आश्चर्य हो रहा है, क्या मेरे बारे में आपको किसी ने बताया नही?"
मैं बोला,"आज के जमाने में मैं उन बातों नहीं मानता।"
उसने एक फूल दिया। मैं लेकर चल पड़ा अपनी दुकान पर पहुंच कर उस फूल को गणेश-लक्ष्मी की तस्वीर पर चढ़ा दिया। मैंनें अनुभव किया कि आज मेरी दुकान अन्य दिनों अपेक्षा अधिक चली। सामान बहुत बिका आय भी बहुत हुई।
फिर तो सिलसिला चल पड़ा मैं रोज एक फूल फुलवा से माँग कर लाता दुकान पर चढ़ाता। मेरी आय बढ़ने लगी।मुझे शंका हुई यह फुलवा का टोना तो नहीं। किन्तु बढ़ती आय के लालच में मैं फुलवा से फूल लेता रहा। धीरे-धीरे हमारी और उसकी घनिष्ठता बढ़ती गई। मैं बिना पूछे ही फूल तोड़ने लगा।
कुछ दिनों के बाद फुलवा मुझसे खुल गयी बोली,"तुमने मेरे बारे में सुना तो होगा ही कि मैं टोना-टोटका करतीं हूॅ। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। मुझे यह सब नहीं आता, न जाने क्यों लोग हवा उड़ातें हैं। मुझे बच्चों से बहुत प्रेम है जब बच्चा न होने के कारण मेरे आदमी ने मुझे छोड़ दिया है, मैं इन फूलों से प्रेम करती हूॅ। यही मेरे बच्चे हैं।"
मैंने उसे अपनी बढ़ती आय के बारे में बताया तो उसने कहा, "सब ईश्वर की माया है, मैं तो बस इन फूलों को अपनी औलाद मानती हूॅ और औलाद माँ का नाम रोशन करतें हैं डुबोते नहीं।"
कुछ दिनों तक मेरे फूलों को लेने का क्रम चलता रहा। मैं अब अनुभव करने लगा लोग हम दोनों की घनिष्ठता को शक की नजरों से देख रहें हैं। मैंने फुलवा से फूल लेना बन्द कर दिया। दूसरे रास्ते से दुकान जाने लगा। आज उस रास्ते पर बहुत जाम लगा था अतः पुराने रास्ते से दुकान जा रहा था। फुलवा ने मुझे देख लिया आवाज लगाई मैं रूक गया तो बोली,"तुम कई दिनों से आये नहीं, क्या तुमने पूजा छोड़ दी है?"
मैंने उसे पूरी बात बताई कि,"लोग हम पर शक कर रहें हैं।"
वह बोली, "यह दुनिया है ऐसे ही शक करती है, इसका बस चले तो भाई-बहन को भी ना छोड़े। खैर, मैंने तुम्हें अपना भाई माना है, तुम्हारी इच्छा मुझे जो समझो।"
मेरे पास कोई उत्तर न था।लेकिन दूसरे दिन से उसकी बागवानी से फूल लेने लगा।
आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव
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