घर-घर की कहानी
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प्रेम नारायण जी की दो बहुएं थीं।उनमें बहुत मेल रहता था। साथ ही खाती-पीती।घर के सारे काम मिल कर निपटा लेतीं थीं।आपस में कोई वैमनस्यता नहीं रखतीं थीं।दोनों की मिसाल दी जाती थी।प्रेम नारायण और उनकी पत्नी सुखी-सुखी थे।इत्तेफाक से दोनों ने लगभग एक ही साथ बच्चें जन्में।बच्चें तो बच्चें ही होतें हैं।जहाँ मन हुआ गन्दा कर दिया जहाँ मन हुआ पेशाब कर दिया।कभी बड़ी का बच्चा छोटी के बिस्तर पर पेशाब कर देता तो कभी छोटी का बच्चा बड़ी के बिस्तर पर पेशाब कर देता।कभी बड़ी का बच्चा कहीं भी गन्दा कर देता तो कभी छोटी का बच्चा कहीं भी।दोनों एक-दूसरे को बताकर चुप हो जातीं। सोचतीं,"उनका बच्चा है वह साफ करेगी।"
जब-तक असली माँ नहीं आ जाती गन्दा पेशाब तथा बच्चा वैसे ही रहता।दूसरी बच्चे को छूती तक न थी।धीरे-धीरे यह वैमनस्यता इतनी बढ़ी कि दोनों ने अपने-अपने बच्चे को दूसरे के कमरे में सुलाना-रहना बन्द कर दिया।यदि एक का बच्चा दूसरे के घर गन्दा या पेशाब कर देता तो दूसरी नाराज हो जाती, "कितना बदमाश बच्चा है ठीक से नहीं वह रखती है।"
यह नाराज़गी आपसी बुराई में तब्दील होती गयी।दोनों एक-दूसरे के विरूद्ध होने लगीं।दूसरे के बच्चे को अपने कमरे में आने से तथा अपने बच्चे को दूसरे के घर जाने से रोकने लगीं।धीरे-धीरे बात पुरूषों तक पहुँचने लगी।वे आपस में लड़ने लगे।बात बँटवारे तक आ गई।सब बँट गया माँ-बाप रह गए।उनका भी बँटवारा हुआ कि छः महीने बड़े भाई के पास तो छः महीने छोटे भाई के साथ रहेंगे।
प्रेम नारायण जी सब देखते-सुनते रहे।अन्त में उन्होंने कहा, "ठीक है, हमें कोई कष्ट नहीं।मैंने यह मकान बनवाया है और तुम लोग मेरे मकान में रहते हो।मैं अपना मकान नहीं छोड़ूंगा।यदि तुम लोगों को कष्ट हो तो मकान खाली कर दो।और छह-छह महीने आकर रह जाया करो तो हम दोनों के लिए तुम लोगों की छह-छह महीने वाली शर्त भी पूरी हो जाएगी और मकान भी बचा रहेगा।"
अब दोनों बेटों तथा बहुओं को साँप सूंघ गया।कोई कुछ नहीं बोल पाया।
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प्रेम नारायण जी की दो बहुएं थीं।उनमें बहुत मेल रहता था। साथ ही खाती-पीती।घर के सारे काम मिल कर निपटा लेतीं थीं।आपस में कोई वैमनस्यता नहीं रखतीं थीं।दोनों की मिसाल दी जाती थी।प्रेम नारायण और उनकी पत्नी सुखी-सुखी थे।इत्तेफाक से दोनों ने लगभग एक ही साथ बच्चें जन्में।बच्चें तो बच्चें ही होतें हैं।जहाँ मन हुआ गन्दा कर दिया जहाँ मन हुआ पेशाब कर दिया।कभी बड़ी का बच्चा छोटी के बिस्तर पर पेशाब कर देता तो कभी छोटी का बच्चा बड़ी के बिस्तर पर पेशाब कर देता।कभी बड़ी का बच्चा कहीं भी गन्दा कर देता तो कभी छोटी का बच्चा कहीं भी।दोनों एक-दूसरे को बताकर चुप हो जातीं। सोचतीं,"उनका बच्चा है वह साफ करेगी।"
जब-तक असली माँ नहीं आ जाती गन्दा पेशाब तथा बच्चा वैसे ही रहता।दूसरी बच्चे को छूती तक न थी।धीरे-धीरे यह वैमनस्यता इतनी बढ़ी कि दोनों ने अपने-अपने बच्चे को दूसरे के कमरे में सुलाना-रहना बन्द कर दिया।यदि एक का बच्चा दूसरे के घर गन्दा या पेशाब कर देता तो दूसरी नाराज हो जाती, "कितना बदमाश बच्चा है ठीक से नहीं वह रखती है।"
यह नाराज़गी आपसी बुराई में तब्दील होती गयी।दोनों एक-दूसरे के विरूद्ध होने लगीं।दूसरे के बच्चे को अपने कमरे में आने से तथा अपने बच्चे को दूसरे के घर जाने से रोकने लगीं।धीरे-धीरे बात पुरूषों तक पहुँचने लगी।वे आपस में लड़ने लगे।बात बँटवारे तक आ गई।सब बँट गया माँ-बाप रह गए।उनका भी बँटवारा हुआ कि छः महीने बड़े भाई के पास तो छः महीने छोटे भाई के साथ रहेंगे।
प्रेम नारायण जी सब देखते-सुनते रहे।अन्त में उन्होंने कहा, "ठीक है, हमें कोई कष्ट नहीं।मैंने यह मकान बनवाया है और तुम लोग मेरे मकान में रहते हो।मैं अपना मकान नहीं छोड़ूंगा।यदि तुम लोगों को कष्ट हो तो मकान खाली कर दो।और छह-छह महीने आकर रह जाया करो तो हम दोनों के लिए तुम लोगों की छह-छह महीने वाली शर्त भी पूरी हो जाएगी और मकान भी बचा रहेगा।"
अब दोनों बेटों तथा बहुओं को साँप सूंघ गया।कोई कुछ नहीं बोल पाया।
