Thursday, September 5, 2019

                      घर-घर की कहानी
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प्रेम नारायण जी की दो बहुएं थीं।उनमें बहुत मेल रहता था। साथ ही खाती-पीती।घर के सारे काम मिल कर निपटा लेतीं थीं।आपस में कोई वैमनस्यता नहीं रखतीं थीं।दोनों की मिसाल दी जाती थी।प्रेम नारायण और उनकी पत्नी सुखी-सुखी थे।इत्तेफाक से दोनों ने लगभग एक ही साथ बच्चें जन्में।बच्चें तो बच्चें ही होतें हैं।जहाँ मन हुआ गन्दा कर दिया जहाँ मन हुआ पेशाब कर दिया।कभी बड़ी का बच्चा छोटी के बिस्तर पर पेशाब कर देता तो कभी छोटी का बच्चा बड़ी के बिस्तर पर पेशाब कर देता।कभी बड़ी का बच्चा कहीं भी गन्दा कर देता तो कभी छोटी का बच्चा कहीं भी।दोनों एक-दूसरे को बताकर चुप हो जातीं। सोचतीं,"उनका बच्चा है वह साफ करेगी।"
जब-तक असली माँ नहीं आ जाती गन्दा पेशाब तथा बच्चा वैसे ही रहता।दूसरी बच्चे को छूती तक न थी।धीरे-धीरे यह वैमनस्यता इतनी बढ़ी कि दोनों ने अपने-अपने बच्चे को दूसरे के कमरे में सुलाना-रहना बन्द कर दिया।यदि एक का बच्चा दूसरे के घर गन्दा या पेशाब कर देता तो दूसरी नाराज हो जाती, "कितना बदमाश बच्चा है ठीक से नहीं वह रखती है।"
यह नाराज़गी आपसी बुराई में तब्दील होती गयी।दोनों एक-दूसरे के विरूद्ध होने लगीं।दूसरे के बच्चे को अपने कमरे में आने से तथा अपने बच्चे को दूसरे के घर जाने से रोकने लगीं।धीरे-धीरे बात पुरूषों तक पहुँचने लगी।वे आपस में लड़ने लगे।बात बँटवारे तक आ गई।सब बँट गया माँ-बाप रह गए।उनका भी बँटवारा हुआ कि छः महीने बड़े भाई के पास तो छः महीने छोटे भाई के साथ रहेंगे।
प्रेम नारायण जी सब देखते-सुनते रहे।अन्त में उन्होंने कहा, "ठीक है, हमें कोई कष्ट नहीं।मैंने यह मकान बनवाया है और तुम लोग मेरे मकान में रहते हो।मैं अपना मकान नहीं छोड़ूंगा।यदि तुम लोगों को कष्ट हो तो मकान खाली कर दो।और छह-छह महीने आकर रह जाया करो तो हम दोनों के लिए तुम लोगों की छह-छह महीने वाली शर्त भी पूरी हो जाएगी और मकान भी बचा रहेगा।"
अब दोनों बेटों तथा बहुओं को साँप सूंघ गया।कोई कुछ नहीं बोल पाया।
                            चापलूसी
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ज्वाला प्रसाद मिश्रा,
इनका नाम ही नहीं है।बल्कि दूसरों को देखकर जलना और कूढ़ना इनकी आदत में है।हैं तो बड़े बाबू लेकिन दूसरों की शिकायत अधिकारियों से करतें हैं और आजकल अधिकारी भी कान के कमजोर होतें हैं तथा चापलूसी अधिक पसंद करतें हैं इसलिए ज्वाला प्रसाद मिश्रा की चाँदी ही रहती है।इसी चापलूसी के दम पर वे इंचार्ज बन बैंठे हैं।ऐसा नहीं कि वह इस पद के लायक हैं या वरिष्ठ हैं किन्तु चापलूसी के कारण इंचार्ज हैं।अधिकारी कान के कच्चे हैं सो एक आदमी,जो पहले से काम करता आ रहा था, उसे हटाकर मिश्रा जी को सर्वेसर्वा बना दिया है।
चूँकि अधिकारी की निगाह में अच्छे हैं।अतः पैसा भी जी भर कमाते हैं।जब चाहा तब किसी को इस मेज से हटाकर उस मेज कर दिया।अब इस काम के लिए पैसा ऐंठना तो लाज़िमी ही है न।एक अच्छे -खासे व्यक्ति को अपने साथ सटाये रहतें हैं।वह बिचौलिए का कार्य करता है।मेरी भी शिकायत कई बार कर चुके हैं।अधिकारी भी इनके कहने के अनुसार ऑफिस का  कई बार मुआयना कर चुके हैं कई लेकिन हर बार बेचारे मुंह की खा जातें हैं।ज्वाला जी जब कभी भी डाँट खातें हैं तो उनका मुंह देखने लायक रहता है।कहतें हैं न,कुत्ते की दुम सीधी नहीं होती,फिर अधिकारी के कान भरना तथा दूसरों की शिकायत करना शुरू कर देंते हैं।अधिकारी कान के कच्चे फिर इनकी बातों में आ जातें हैं।
एक दिन ज्वाला प्रसाद जी शाम को घर जा रहे थे।थोड़ा सा दिमाग उलझा था उनका।चापलूस होने के बाद भी उस दिन डाँट खा गये थे।एक ट्रक से टकरा गये बेचारे।जिस आदमी को हटवा कर इंचार्ज बने थे उसी आदमी ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया।डाॅक्टर को दिखाया।कई दिनों तक अस्पताल में रहे लेकिन कोई अधिकारी देखने नहीं आया।उन्हें अब समझ में आया कि चापलूसी करके कुछ नहीं मिलता।मिलता है तो अपने व्यवहार से।

Wednesday, September 4, 2019

प्रेम की भाषा

प्रेम की भाषा
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राम प्रकाश जी की उम्र होगी लगभग ५६ साल की, साधारण परिवार से हैं और ऑफिस में बाबू हैं।बड़ी मुश्किल से कालोनी में मकान बनवा पायें हैं।इनको लक्ष्मण तथा लखन नाम बहुत पसंद है अतः दोनों लड़कों का नाम भी लक्ष्मण व लखन ही रख दिया। बड़े का नाम लखन तो छोटे का लक्ष्मण रखा।लखन कचहरी में पेशकार तो लक्ष्मण बैंक में नौकरी करता है। लखन की शादी भी कर चुके हैं। उसकी पत्नी छोटे कद की है साथ ही कुछ मोटी, कहने का मतलब गोल-मटोल है। लेकिन स्वभाव से बहुत अच्छी मिलनसार, हँस-मुख, दूसरों की कद्र करने वाली, बड़ों को उचित आदर देती है तो छोटों को उनका प्यार, कोई भी मौका हो हर मौके में सबकी सहयोगी, यही कारण है कि घर से लेकर पास-पड़ोस सब जगह पसंद की जाती है, किन्तु किस्मत की मारी शादी के पाँच साल बाद भी बच्चा न जन्म सकी।
लक्ष्मण भी शादी योग्य हो गया था सो राम प्रकाश जी ने उसकी भी शादी कर दी।आज-कल लड़का जे ई हो, बैंक में हो,
रेलवे में हो, एल आई सी में हो अर्थात कुल मिलाकर ऐसी ही सरकारी नौकरी में हो पत्नी के माने में वह किस्मत वाला होता है।लक्ष्मण तो बैंक में है पत्नी सुन्दर मिली। पढ़ी-लिखी भी है, लम्बी छरहरी। सुरभि (लक्ष्मण की पत्नी) ससुराल में रहने लगी तो हर क्षेत्र में अपना एकाधिकार जमाने की कोशिश करने लगी। जेठानी (कमला) की लोकप्रियता उसे पसंद न आती। वह सोचती, "कमला नाटी और मोटी है, मुझसे कम सुन्दर है, मैं अधिक पढ़ी-लिखी हूॅ तब मुझे अधिक प्यार मिलना चाहिए। मेरे में क्या कमी है जो उसे लोग अधिक पसंद करतें हैं?"
यह सोच उसकी कुढ़न में बदलने लगी। सास-ससुर हों या कमला सबसे कूढ़ने लगी। हर सवाल का जवाब उल्टा देने लगी।बात-बात पर गुस्सा उसकी नाक पर रहता, पास-पड़ोस से भी उसके सम्बन्ध बिगड़ते चले गए, धीरे-धीरे वह लक्ष्मण से अलग रहने को कहने लगी। लक्ष्मण टाल जाता था तो मुंह फुला लेती और कई-कई दिनों तक किसी से बात न करती। राम प्रकाश जी और उनकी पत्नी सब देख-समझ रहे थे।
जब बहुत अति हो गई तो लक्ष्मण से एक दिन कह दिया, "बेटा, अब अलग होने में ही भलाई है तुम्हारी भी तथा हम लोगों की भी।क्योंकि बहू का व्यवहार सहा नहीं जाता। कमला को बाँझ कहती है। हम लोगों को भी जो जी में आता है बक देती है।"
लक्ष्मण ने बहुत कोशिश की, कि अलग न हों लेकिन सुरभि की जिद व घर वालों से उसके व्यवहार के कारण उसने अलग ही होने में भलाई समझी। अतः सुरभि के साथ किराये के कमरे में रहने लगा।
एक साल बाद सुरभि गर्भवती हुई। डाॅक्टर को दिखाया तो उसने कहा, "केस बिगड़ा हुआ है, इन्हें आराम की सख्त जरूरत है।"
किसे बुलाया जाये समस्या थी, लक्ष्मण के घर वालों को सुरभि पसंद नहीं करती थी, मायके वालों ने अपनी मजबूरी जता दी।दुबारा डाॅक्टर को दिखाया तो उसने चेतावनी दे दी। थक-हार कर लक्ष्मण ने घर वालों को बताया। सुरभि बोली, "आयेगा कौन वही बाँझ?"
लक्ष्मण ने मजबूरी जताते हुए कहा, "सुरभि, बात समझा करो, चलो मान लेता हूॅ भाभी ही आयेंगी, लेकिन मत भूलो कि मौके पर गधे को भी बाप कहना पड़ता है।"
दूसरे दिन कमला पहुंच गई।पूरा काम संभाल लिया।लक्ष्मण से बोली, "देवर जी, आप अपनी नौकरी देखिए बस।सुरभि को मैं देख लूंगी।"
वह सुरभि की सेवा-सुश्रुषा में लग गयी। सुरभि को काम न करने देती। अबकी डाॅक्टर ने कहा, "हालत में सुधार है।बस बच कर रहिएगा।"
धीरे-धीरे दिन आ गया, सुरभि अस्पताल में भर्ती हो गई, कमला उसके साथ रहती।डाॅक्टर ने कहा, "ऑपरेशन होगा।"
सुरभि घबड़ाई, कमला समझाती , "कुछ नहीं होगा, मैं हूॅ।"
ऑपरेशन से बच्चा हुआ, सुरभि बहुत देर बाद बेड पर आई, होश आने पर बच्चे को देखा, लेकिन कमला को न देखकर बोली, "दीदी कहाँ है?"
कोई समझ नहीं पाया किसे पूछ रही है? वह बोली, "कमला दीदी को पूछ रही हूॅ।"
सभी भौंचक्के रह गए, कमला के लिए सुरभि के मुंह से  "कमला दीदी"  सुनकर, लक्ष्मण ने बताया, "बाहर बैठीं हैं, उन्होंने कोई बच्चा नहीं जन्मा है न इसलिये बच्चे को छूते डर रहीं हैं।"
सुरभि बोली, "बुला दो"  उसकी ऑखों के कोरों से ऑसू बहने लगे।
तभी कमला आ गई, सुरभि ने उसे अपने पास बुला लिया, बच्चे को उसकी गोद में दे दिया, कमला समझ न पाई क्या हो रहा है?
सुरभि बोली, "दीदी, यह बच्चा तुम्हारा ही है।अगर तुम न आती  तो न मैं रहती न यह बच्चा।"
कहकर वह सुबकने लगी, पता नहीं कमला का एक हाथ सुरभि के बालों को कब सहलाने लगा।
उसे पता तब चला जब सुरभि ने कहा, "दीदी क्षमा----------"
आगे न बोल सकी।
कमला ने कहा,"पगली कहीं की।"

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव

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