Monday, September 23, 2019

                      बच्चें तो बच्चें ही होते हैं
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घटना बिल्कुल सत्य है।मेरी ऑखों देखी है इसमें कुछ भी नहीं जोड़ा या घटाया नहीं गया है।मैं प्रयागराज में रहता हूॅ इसलिये कुम्भ मेला देखने का अवसर मिलता ही रहता हूॅ।इस मायने में मैं खुशकिस्मत हूॅ।वैसे यह मेला हर साल लगता है लेकिन छोटे रूप में जिसे "माघ मेला" कहतें हैं।हर बारह साल बाद पूर्ण कुम्भ लगता है।लेकिन बीच में छः साल बाद अर्द्ध कुम्भ मेला लगता है।इस मेले की अहमियत वही जान सकता है जो मेले में आया हो।हर ओर भक्ति का आलम।साधु-संतों की भीड़।विदेशी सैलानियों तथा भक्तों का जन सैलाब।केवल कल्पना ही की जा सकती है।कहते हैं समुद्र-मंथन के बाद अमृत की कुछ बूंदें यहाँ गंगा-यमुना-सरस्वती के तट पर गिर पड़ीं थीं अतः इस मेले में तीनों पवित्र नदियों के संगम में स्नान करने से सारे पाप धुल जातें हैं।एक ओर अकबर का किला है तो दूसरी ओर लेटे हुए हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है।किले में अक्षय वट है कहतें हैं पहले ऋषि-मुनि इस पर से यमुना में छलांग लगा देते थे तो सीधे स्वर्ग पहुंच जाते थे।यह बात सच है या गलत मैं नहीं जानता लेकिन ऐसी किवदंती है।
हाँ तो,
इस बार भी मैं अर्द्ध कुम्भ मेला घूम रहा था परिवार के साथ था।अचानक मेरी नजर एक आधुनिक और अप टू डेट दम्पति पर पड़ी।जिसके साथ दो बच्चें थे एक चार-पाँच साल का लड़का और एक लड़की आठ-दस साल की।लड़का दम्पति की तरह अप टू डेट था जब कि लड़की बहुत ही साधारण यहाँ तक कि हवाई चप्पल पहने थी।दम्पति लड़की से ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसे वह उनकी नौकरानी हो।एक जगह एक गुब्बारे बेंचने वाला गुब्बारा बेंच रहा था।लड़के ने जिद की तो दम्पति ने लड़की से एक ही गुब्बारा मंगवाया।लड़की गुब्बारे से खेलने लगी तो लड़के की माँ तुरन्त डपट पड़ी,"पगली गुब्बारा टिंकू के लिए मंगवाया है तेरे लिए नहीं।चल टिंकू को दे दे।दुष्ट कहीं की।"
लड़की ने गुब्बारा लड़के को दे दिया लेकिन हसरत भरी नजरों से गुब्बारे को देखते रह गई।मैंने भी अचरज से दम्पति को देखता रह गया।सोचा एक गुब्बारा लड़की के लिए भी खरीद दूं।लेकिन दम्पति बुरा न मान जाये इस डर से नहीं खरीदा।मन मसोस कर रह गया।सोचने लगा,"बच्चें तो बच्चें ही होंते हैं।फिर इतना अन्तर क्यों?"

Sunday, September 22, 2019

                         दुःख है इस बात का
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मुझे दुःख इस बात का नहीं,
कि,
लोगों ने धोखा दिया,
दुःख तो इस बात का है,
कि,
अपनों ने ही धोखा दिया।
जिन्हें समझता था अपना,
वह पराये हो गये,
और,
जो पराये थे,
पराये ही रह गये।
न पराये अपने हो सके,
न अपने ही अपने रह सके,
जाने क्या कमी है मुझमें,
किसी को न अपना कर सका।
अगर हो पता तुम्हें,
तो,
मुझमें ऐसी क्या कमी है,
कि,
हर व्यक्ति मुझसे पराया हो गया,
बता दो मुझे ऐ दोस्त,
कमी अपनी दूर कर सकूं।
                          जानें क्यों
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जाने क्यों पापा गुमसुम रहतें हैं?मम्मी गयी साथ में पापा के ओंठो की हँसी और उनकी मुस्कारट को लेंती गयीं।यह बात नहीं कि पापा अब हँसते नहीं।अब भी हँसते हैं लेकिन खोखली हँसी।अब पापा दार्शनिक हो गये हैं।दार्शनिक जैसे बातें करतें हैं।मुझे याद है मेरी शादी के लिए कितने उत्सुक थे पापा।रोज कोई न कोई प्रोग्राम बनाते रहते थे।रीना की शादी में ऐसे करूँगा कि दुनिया देखेगी।मम्मी से हमेशा ही कहते रहते थे,"मेरी तो इकलौती संतान है रीना अपनी पूरी ख्वाहिश पूरी कर लूँगा।"
लेकिन मम्मी का गुजरना जैसे पापा की उत्सुकता को लेता गया।मैं और पापा दो ही व्यक्ति बचे थे घर में।यह नहीं कि पापा ने मेरी शादी में कोई कमी रखी थी।खूब बढ़-चढ़ कर मेरी शादी की है।सभी बारातियों और मेहमानों ने खूब बढ़ाई की थी शादी की।हर इंतजाम की खुल कर वाह-वाही की थी।लेकिन पापा मैंने अनुभव किया कि वह उतने उत्सुक नहीं थे जितना मम्मी के रहते होंते।
मैं ससुराल आ गई वहाॅ पापा अकेले रह गए।मन उन्हीं में लगा रहता।देवेन्द्र ने बहुत कोशिश की बहलाने की लेकिन मन,"पापा-पापा" ही करता रहता।मैं पापा से मिलने का कोई न कोई बहाना खोजती रहती।मेरे ससुराल वालों को बुरा लगना लाज़िमी था।लेकिन "पापा"के आगे कुछ दिखता ही नहीं था मुझे।पापा शुगर तथा हार्ट के मरीज भी थे सो "उन्होंने दवा खाई या नहीं" यह चिन्ता भी मुझे लगी रहती।दिन भर में जब तक तीन-चार बार फोन से बात न कर लेती चैन नहीं होता था।
एक बार सासू माँ बीमार थी और पापा पर शुगर ने अटैक कर दिया।मैंने देवेन्द्र से बहुत कहा कि,"पापा के पास पहुंचा दो।शुगर बढ़ गया है उनका।"
देवेन्द्र कहते,"माँ बीमार है उनको कौन देखेगा?"
मैंने कहा,"तुम जो हो।"
लेकिन देवेन्द्र पापा के पास मुझे ले जाने को तैयार न थे।मैं खुद ही अकेले पापा के पास पहुंच गई।पापा ने मुझे देखा और खोखली हँसी हँसकर बोले," तुम आ गई?अकेले आई हो? देवेन्द्र कहाँ हैं? तुम्हारी सासू माँ कैसी हैं?"
मैंने कहा,"बीमार ही हैं।"
पापा तुरन्त आपे से बाहर हो गए,"तुम्हें बुलाया किसने था?जो यहाँ आ गयी?अपनी सास को बीमार छोड़कर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की?मेरा नाम तुमने डुबो कर रख दिया।क्या सोचते होंगे ससुराल वाले?यही न कि हमने तुमको बाँध रखा है?मेरी मोह-माया से तुम छूट नहीं पाई हो?मुझे तुमसे कोई प्यार-मोहब्बत नहीं है।अभी इसी वक्त उल्टे पाँव अपने ससुराल चली जाओ।सास को देखो।"
पापा का यह रूप देख मैं दंग रह गई।तुरन्त ससुराल लौट पड़ी।आज पापा नहीं हैं।लेकिन उनका सबक मुझे अबतक याद है।
आज मेरे चाचाजी मेरे घर आये थे।पापा की एक चिट्ठी,जो मेरे नाम से थी, दे गये हैं।मैंने चिठ्ठी पढ़नी चाही लेकिन सासू माँ को देखने मुहल्ले की औरतें आ गयीं थीं।अतः चिठ्ठी आलमारी में रख दी।रात को समय मिला तो खोल कर पढ़ने लगी।लिखा था,"प्रिय बेटी,
                    क्षमा करना मैंने तुम्हें डाँटा।मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूॅ।मैंने तुम्हें इसलिये डाँटा था तुम मेरी मोह में ससुराल से अलग हो रही थी जो शादी के बाद तुम्हारा असली घर है---------------------।"