मेरे पिताजी का मेरा भविष्य बनाने में सहयोग
मैं जानता तो था ही की दस पैसे हैं, फिर भी पाॅकेट में हाथ डालकर बोला, "दस" पिताजी बोले, "नहीं, पन्द्रह होंगे बीस थे, पाँच तुमको दिये, तो पन्द्रह होने चाहिए पाँच कहाँ चले जायेंगे?" अब तो मेरी हलात ख़राब समझ गया, चुराये पाँच पैसे के सिक्के का राज खुलने वाला है, फिर भी गब्बर बनकर बोला, "नहीं अभी-अभी तो आपने पाॅकेट दिखवाई है, पन्द्रह पैसे ही तो थे। पिताजी बोले, "अच्छा दरवाजा अन्दर से बन्द कर दो नींद आ रही है मुझे, सोने दो।" मैंने दरवाजा अन्दर से बन्द कर दिया,उसके बाद?
उसके बाद, पिताजी ने बगल से छड़ी उठाई, जो पहले से उन्होंने छुपा कर रखी थी, बन्द कमरे में, मैं और वे, उनके हाथ में छड़ी अंदाज लगाइए क्या हुआ होगा। दे दनादन दे दनादन, पिताजी ने मुझको पच्चीसों छड़ी मारी। बोलते रहे, "पैसा भी चुराता है और झूठ भी बोलता है।" उस समय पिताजी दुश्मन लग रहे थे पर अब उनको धन्य समझता हूॅ, उस दिन के बाद से मैंने चोरी नहीं की और मैं चोर बनने से बच गया पान तो भूल ही गया। कभी कभी पत्नी के पैसे मौका पाकर उड़ा देता हूॅ।
भाई,इतना तो चलता ही है ना?
आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव
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