पिताजी का त्याग
बात उन दिनों की है, जब मैने अपनी नयी नयी नौकरी शुरू ही की थी, शुरुवाती नौकरी थी, तो पैसे ज्यादा नहीं मिला करते थे, गुजारे के लिए घर से भी पैसे लेने पड़ जाते थे, जैसे तैसे एक महीने का गुजरा होता था| हालात ऐसे थे कि तीन दो शर्ट और दो पैंट और एक जोड़ी घिसे हुए जूते को बदल बदल कर रोजाना एक साल ऑफिस गया था, शर्म भी आती थी, लेकिन घर से पैसे मांगने की हिम्मत न होती थी और पिता जी का रिटायरमेंट भी पास आ चूका था, तो जैसे तैसे बस गुजारा कर रहा था | जन्माष्टमी की छुट्टियाँ हुयी थी, दो दिनों की सोचा घर हो लूं, वैसे भी होली के बाद से जाना न हो पाया था |
तो बस ऑफिस का काम ख़त्म करके, रात की ट्रैन पकड़ा और सुबह घर पे पहुँच गया | बरसात का मौसम था सो बरसात होती रहती थी।पिताजी का ऑफिस दूर था तो उन्हें सुबह ही निकलना पड़ता था, पिताजी मेरी हर जरूरत को बिना कहे ही जान लेते थे, मुझसे भी अधिक मेरी आवश्यकताओं को समझते थे।पुराने कपड़े जितना छुपाऊँ वे जान जाते थे, मोजे-जूते कितना भी छुपाऊँ पर उनकी नजरों से छुप नहीं पाते, शाम को पिताजी घर पे आये चाय-पानी पीते हुए दिल्ली के हालात के बारे में पूछा, मैंने भी अपने हालात को छुपाते हुए दिल्ली के बारे में सब बता डाला, पर कहा जाता है न, बाप तो बाप ही होता है, उनकी नज़रों से बचना मुश्किल था और उन्होंने बातो बातो में मेरी तंगहाली का अंदाज़ा लगा लिया और सुबह ऑफिस जाते हुए माँ को पैसे देते हुए बोले, "उसके लिए जूते खरीदवा देना आज" माँ ने मुझे जूतों के पैसे दिए और मैं दिन मे नये जूते ले आया | ऑफिस से पिताजी आये तो बरसात हो रही थी, पानी से तरबतर थे, उन्हें ठंड भी लग गयी थी, परन्तु आते ही पूछा, "जूते लाये?" मैं भाव विभोर हो गया, सोचा इस हालत में भी इन्हें मेरी ही चिन्ता है। हालाँकि उन्हें रेन सूट लेना चाहिए था पर पिताजी ने अपनी चिन्ता नहीं की, मैंने भी सोचा आगे से मैं अपनी आवश्यकता से पहले पिताजी की चिन्ता करूँगा।
आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव
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