Friday, August 2, 2019

कविता

माँ को समर्पित
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माँ का ऑचल कितना प्यारा है,
बचपन उसकी छाँव में बीता,
मैंने कोई दुःख न जाना,
सब विलीन हो गये उसके ऑचल में।
मैंने तो अब समझा है,
माँ कैसी होती है,
जवान होने पर भी,
वह समझाती रहती थी।
किन्तु,
मैं समझता था उसको,
"इसकी तो आदत है,
बकवास करने की ।"
लेकिन,
यह समझ न पाया,
"वह जो भी कहती थी,
अपने अनुभव पर कहती थी,
और,
मेरे हित की कहती थी"
क्योंकि मैं उसका बेटा हूॅ।
मेरा यह कह देना,
"माँ,
तुम चुप भी रहा करो,
मैं अब बच्चा नहीं हूॅ,
दुनिया को समझता हूॅ,
तुमको क्या पता है,
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंची है।"
सुनकर मेरी बातों को,
उसका चुप हो जाना,
अब,
मेरे दिल को कष्ट देता है।
मैं तो अब बड़ा हो गया हूॅ,
माँ न रही इस दुनिया में,
अब जब भी कष्ट होता है,
किसी दुःख में पड़ता हूॅ,
जब रोने का मन होता है,
ऑचल उसका खोजता हूॅ,
जिसके छाँव तले,
दुनिया से अलग,
मैं कुछ देर रो सकूं।
कहाँ मिलता है,
वह प्यारा ऑचल,
कहाॅ वह माँ मेरी है,
खोजने लगता हूॅ,
अब कमी माँ की खलती है,
उसके ऑचल की खलती है,
पर,
न अब मेरी माँ रही,
न उसका ऑचल रहा,
मैं दुनिया में खुद को तन्हा पाता हूॅ।







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