Monday, September 30, 2019

                 ख्वाहिश
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ख्वाहिशें लेकर चले थे प्यार के समंदर में,
न इधर के रहे न उधर के रहे,
डूब रहें हैं हम बीच दरिया मे,
और,
दोनों किनारे दूर दिखतें हैं।
उनको पास लाना संभव नहीं,
उनसे दूर रहना भी संभव नहीं,
करूँ मैं क्या करूँ कुछ समझ में आता नहीं,
और,
वे बेफिक्र हमसे लगतें हैं।
बहुत समझातें हैं खुद को हम,
लेकिन खुद समझ न पातें हैं,
बस,
उनके प्यार के सागर में हम,
गोतें लगातें जातें हैं।।

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