Friday, August 2, 2019

कविता

माँ को समर्पित
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माँ का ऑचल कितना प्यारा है,
बचपन उसकी छाँव में बीता,
मैंने कोई दुःख न जाना,
सब विलीन हो गये उसके ऑचल में।
मैंने तो अब समझा है,
माँ कैसी होती है,
जवान होने पर भी,
वह समझाती रहती थी।
किन्तु,
मैं समझता था उसको,
"इसकी तो आदत है,
बकवास करने की ।"
लेकिन,
यह समझ न पाया,
"वह जो भी कहती थी,
अपने अनुभव पर कहती थी,
और,
मेरे हित की कहती थी"
क्योंकि मैं उसका बेटा हूॅ।
मेरा यह कह देना,
"माँ,
तुम चुप भी रहा करो,
मैं अब बच्चा नहीं हूॅ,
दुनिया को समझता हूॅ,
तुमको क्या पता है,
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंची है।"
सुनकर मेरी बातों को,
उसका चुप हो जाना,
अब,
मेरे दिल को कष्ट देता है।
मैं तो अब बड़ा हो गया हूॅ,
माँ न रही इस दुनिया में,
अब जब भी कष्ट होता है,
किसी दुःख में पड़ता हूॅ,
जब रोने का मन होता है,
ऑचल उसका खोजता हूॅ,
जिसके छाँव तले,
दुनिया से अलग,
मैं कुछ देर रो सकूं।
कहाँ मिलता है,
वह प्यारा ऑचल,
कहाॅ वह माँ मेरी है,
खोजने लगता हूॅ,
अब कमी माँ की खलती है,
उसके ऑचल की खलती है,
पर,
न अब मेरी माँ रही,
न उसका ऑचल रहा,
मैं दुनिया में खुद को तन्हा पाता हूॅ।







प्रार्थना

जय श्री राम
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श्री हनुमते नमः

चले श्री राम दूत हनुमान,
सीता का पता लगाने को,
आकाश मार्ग को वे उड़े,
पवन से भी तेज वेग उनका था।
छलांग लगाई जिस पर्वत से,
चला गया वह जमीन के अन्दर,
"जय श्री राम"का उद्घोष लगाकर,
चल पड़े समुद्र उस पार।
समुद्र पार एक पर्वत पर चढ़कर,
देखा सोने की लंका को,
अति प्यारी अति सुन्दर,
छटा अति निराली थी उसकी।
दानव दिग्गज अति बलशाली को,
मल्लयुद्ध करते देखा,
किसी को मदिरा-मांस का,
सेवन करते देखा।।

मेरी बेरोजगारी


मेरी बेरोजगारी

Unemployement

मेरा परिचय,
मेरा नाम शिवाकान्त है, लोग मुझे शिवा भी कहतें हैं, उम्र -29 वर्ष।
शिक्षा-बी टेक
बेरोजगार 
दुबला-पतला, बुझे चेहरे वाला, बेतरतीब सा रहने वाला, समाज से कटकर रहने वाला जिसे अकेला पन ही पसंद है।
मेरे दोस्त? 
न के बराबर।
बचपन की दोस्त शिवांगी ही मेरी सबसे अच्छी दोस्त है, वह सोचती है, एक दिन मैं नौकरी पा जाऊँगा तो मुझसे शादी कर लेगी, पागल कहीं की। उसे क्या पता मैं आवेदन-पत्र भरते-भरते ऊब गया हूॅ, लिखित और साक्षात्कार भी दे चुका हूॅ, लेकिन इस जमाने में योग्यता नहीं कुछ और चाहिए जो मेरे पास नहीं है, आखिर मेरी बेरोजगारी के कारण ही पिताजी ने मेरे लिए एक पान की दुकान खुलवा दी है।
मुझे याद है, जब मैंने बी टेक 75% नम्बरों से पास किया था, तो पिताजी ने माँ से कितने गर्व से कहा था, "मेरा बेटा पढ़ने में शुरू से ही तेज रहा है, अब कहीं न कहीं तो लग ही जायेगा। हमें क्या? बुढ़ापा चैन से कटेगा।"
किन्तु अब पिताजी का ऑफिस से आने के बाद थके मन से कुर्सी पर बैठ जाना यह बताने लगा है कि वे समय से पहले बूढ़े हो रहें हैं, मैं पिताजी पर बोझ ही तो हूॅ। शिवांगी कुछ समझती ही नहीं।
कहती है, "एक दिन तो नौकरी पा ही जाओगे फिर हम दोनों-----------।
मैं समझाता, "पागल हो तुम, अभी मैं खुद ही बाप पर बोझ हूॅ अभी उनकी तनख्वाह खा रहा हूॅ फिर पेंशन खाऊँगा, क्या तुमको भी उन पर बोझ बना डालूँ।
एक दिन पिताजी ऑफिस से आये, उनके हाथ में निमंत्रण-पत्र देख कर माँ ने पूछा,"किसकी शादी का कार्ड है? "
पिताजी बोले, "अरे,नुक्कड़ वाले शर्मा जी की लड़की की शादी है।"
माँ ने कहा, "उनकी लड़की का नाम तो शालिनी है, विद्या की सहेली है।"
पिताजी, "हाँ, उसी की शादी है।"
माँ ने कहा, "चलो, शर्मा जी तो गंगा नहा लिये। हम कब नहातें हैं देखो?"
पिताजी बोले, "बात तो सही कहती हो, शिवा की माँ, कोशिश तो बहुत कर रहा हूॅ, लेकिन जहाँ जाता हूॅ, लड़के वालों के भाव सुनकर पसीने छोड़ देता हूॅ। देखती नहीं, शर्मा जी मेरे ही साथ काम करतें हैं ऊपरी कमाई भी खूब करतें हैं, उसी से लड़के की नौकरी लगवा दी है, लड़की की शादी भी कर रहें हैं, सोचता हूॅ ईमानदारी बहुत कर ली अब मैं भी--------।
माँ ने कहा, "न न यह मत करना। पाप पाप होता है, लड़का भी यही सीखेगा, ऊपर वाला सब देखता है।"
पिताजी ने कहा, "वह तो अंधा है, उसके भक्त केवल पैसे वाले ही होतें हैं। न तो विद्या की शादी तय हो रही है न ही शिवा की---------"पिताजी एक गहरी साँस लेकर चुप हो गए।
लेकिन इस गहरी साँस ने बहुत कुछ कह दिया, मेरे लिए कमरे में बैठना भारी हो गया।
बाहर सड़क पर आ गया, घूमने लगा इधर-उधर लोगों को फालतू देखने लगा, समय "किल" करने लगा।
बगल वाले पार्क में पहुंच गया तो देखा कि एक नव विवाहित जोड़ा गलबँहियां किये बैठा था। अपने बैग के प्रति लापरवाह था। मैंने सोचा, "क्यों न यह बैग ही उठा लूं? हो सकता है पैसों से भरा हो।"
लेकिन माँ के शब्द कानों में गूँज उठे, "पाप पाप होता है।" पारिवारिक संस्कारों ने मुझे रोक दिया।
पार्क से निकला तो सामने एक सिनेमा हॉल दिखा।
सोचा, "पिक्चर ही देख लूं कुछ समय बीत जायेगा।"
लेकिन भूख भी लगी थी, सामने चना-लाई भूनने वाला भी था। पाॅकेट में हाथ डालकर देखा तो पाया कि कुछ खाता हूॅ तो पिक्चर के लिए  पैसे कम पड़ जायेंगे।
कुछ देर सोचता रहा, "क्या करूँ? चना खाऊँ या पिक्चर देखूँ? एक काम से समय बीतेगा दूसरे से भूख।"
मुझे समय बिताने की गरज अधिक थी। अतः सरकारी नल पर भरपेट पानी पीने के बाद मेरे पैर खुद ब खुद सिनेमा हाल की तरफ बढ़ गये।

आज के लिए इतना ही...धन्यवादअगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव
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