एक सलाह
शादी के बाद लगभग हर दम्पति की इच्छा होती है माँ-बाप बनना। इसकी अनुभूति वह लड़की कर सकती है जो माँ बनने वाली होती है, "कैसी होगी मेरी संतान? कितनी प्यारी होगी? लड़का होगा या लड़की? उसको ऐसे रखूंगी वैसे रखूंगी आदि-आदि।"
जन्म देने के बाद लड़की सबसे पहले अपने पति को ही खोजती है, पति को देखकर उसकी पहली मुस्कान उसकी खुशी को जाहिर करती है।
अब जब बच्चा कुछ बड़ा होता है तो उसके चरित्र निर्माण की पहली जिम्मेदारी माँ-बाप की होती है कि वे बच्चे को जिद्दी, जिसे दूसरे शब्दों कह सकतें हैं एकाकी या सामाजिक बनातें हैं। जिद्दी बच्चा कभी भी सामाजिक नहीं हो सकता माँ-बाप को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए। क्योंकि वह हर चीज पर अपना स्वामित्व स्थापित करना चाहेगा जो आगे चलकर उसे अपने दोस्तों से अलग कर देगा। जिसके जिम्मेदार खुद माँ-बाप ही कहें जायेंगे।
बचपन में तो यह बहाना चल जाता है कि, "क्या करें इसके बाबा-दादी को कैसे मना कर दें? बड़े भाई साहब को कैसे मना कर दें जब देखो मोबाइल थमा देतें हैं।"
माँ-बाप कुछ भी कहें लेकिन सत्यता यह है कि आगे चलकर माँ-बाप ही उसके जिद्दी पन के जिम्मेदार कहे जायेंगे और बच्चा जिद पूरी न होने पर गलत राह पर चल पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। बचपन नींव है बच्चे के जीवन की, अब माँ-बाप नींव जैसी रखेंगे जीवन की इमारत वैसी ही खड़ी होगी। यह कह देना, "अभी बच्चा है बड़ा होकर खुद ही सुधर जायेगा।" हास्यास्पद कहा जायेगा।
अरे भाई, बिगाड़ आप रहें हैं, जिद्दी आप बना रहें हैं और सुधरने की जिम्मेदारी खुद बच्चे की?
वाह भाई वाह, खूब कही आपने। होश में आइये जनाब बच्चे को जिद्दी मत बनायें, मोबाइल आदि से उसे दूर ही रखें, कोई बनाता देता है तो विनय पूर्वक उसे रोक दीजिए। बच्चा आपका है, उनका नहीं, भविष्य देखिए भविष्य, वर्तमान नहीं। बच्चा जो अभी सीखेगा उसी पर तो भविष्य निर्भर करेगा, नहीं तो बाद में हाथ मलने के सिवाय कुछ न बचेगा और फिर,
"अब पछताये होत क्या,
जब चिड़िया चुग गयी खेत।"
आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव
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