Saturday, August 10, 2019

ऊँ श्री पार्वती देवी माताय नमः

एक नाम के कई रूप तुम्हारे हैं,
कभी दुर्गा कभी काली बनकर आती हो,
वैष्णवी के रूप में तुमने,
भैरव को मारा था,
किंतु दयावान बहुत हो,
आशीष बाद में दे ही दिया।
काली बनकर आयी थी,
दुष्टों का संहार किया,
दुर्गा बनकर आयी तो,
महिषासुर को मार दिया।
दयावान बहुत हो माता,
साधु-संत जानते हैं,
पर दुष्टों के लिए काल हो,
रौद्र रूप भी रखती हो।।

वह नवजात शिशु

वह नवजात शिशु 

new born baby


मेरा ऑफिस घर से दो किलोमीटर पर है, इसलिए कभी टेम्पो, कभी रिक्शे से, कभी बाइक से, कभी साइकिल से तो कभी मन आया तो पैदल ही ऑफिस आ जाता हूॅ। आज पैदल ही आ रहा था, रास्ते में एक जगह भीड़ दिखी। लोग किसी चीज को देख रहें थे सो जिज्ञासा वश मैं वहाँ पहुँच गया तो देखा एक नवजात बच्ची, जो एकाध ही दिन की रही होगी, कूड़े के ढेर पर लेटी बिलख-बिलख कर रो रही थी। भीड़ में सभी वर्ग के व्यक्ति थे, अमीर और गरीब सब, सब केवल देख रहे थे बच्ची को, कोई पास न जाता था। बल्कि आपस में ही बहस करते थे, किसकी है, कैसे माँ-बाप हैं दुष्ट कि बच्चे को फेंक दिया है लावारिस, जरूर नाजायज औलाद है, कोई पुलिस को फोन करो भाई, अनाथालय को बता दो, बस बात ही बात हो रही थी हवा में। मेरी कोई संतान नहीं है सोचा उठा लूं लेकिन समाज क्या कहेगा, पता नहीं किस जाति की है, अतः हिम्मत नहीं कर पाया।
इन्हीं बातों के बीच एक युवा सी दिखने वाली मजदूर दम्पति ने आगे बढ़कर उसे उठा लिया। लोगों ने कहा, "क्या करते हो, पता नहीं किसका बच्चा है?"
तो औरत बोली, "लगती तो आदमी की ही है। अरे, इसके दूध की व्यवस्था करो कोई, भूखी लगती है।"
लोग खड़े रहे, मैं भागा एक Lactogen-1 का डिब्बा और दूध की बोतल ले आया। पास की चाय की दुकान से पानी गर्म करवा कर दूध बनाया औरत को थमा दिया। उसने बच्ची के मुंह में बोतल लगा दी, बच्ची चुप होकर दूध पीने लगी। इसके पहले कि कोई कुछ बोले वह दम्पति बच्ची को लेकर चलती बनी। मैं उनके पीछे हो लिया।
शाम को उनके घर गया देखा बच्ची सो रही थी। मुझे देखकर पति-पत्नी घबड़ा गये। इसके पहले कि मैं कुछ बोलूँ वे बोल पड़े, "साहब, तीन साल शादी के हो गए कोई संतान नहीं हुई इसलिये इसे उठा लाये हैंं अपनी औलाद बनाकर रखेंगे।"
मैंने कहा,"मैं इसे लेने नहीं आया हूॅ,  बल्कि तुम लोगों को समझाने आया हूॅ कि बाद में किसी कानूनी कार्रवाई में न फँस जाओ।"
उन्होंने मुझे प्रश्न भरी नजरों से देखा मैंने उन्हें कानूनी दाँव पेंच समझाये, मेरी बात समझकर वे घबड़ाये किन्तु काफी मेहनत से मैंने उन्हें वह बच्ची कानूनन दिला दी।
उस बच्ची से मुझे भी लगाव हो गया था। अतः बच्ची की पढ़ाई का जिम्मा उठा लिया। नाम रखा, "अंकिता"
बच्ची उनकी देखभाल और मेरी परवरिश में बड़ी होती गई। किसी अच्छे घर की थी होशियार और बुद्धिमान, कक्षा में प्रथम आती थी, धीरे-धीरे बड़ी होते-होते वह बड़ी अधिकारी बन गई। मजदूर दम्पति के दिन लौट आये रहन-सहन बदल गया उनका, अंकिता उन्हें मम्मी-पापा तो मुझे अंकल कहती है।
अब सोचता हूॅ, यदि ये दम्पति उस दिन हिम्मत न करता तो एक हीरा कहीं खो जाता।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव

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Friday, August 9, 2019

दो भाई

यह दोनों हैं भाई-भाई,
बचपन में एक साथ रहते थे,
खाते-पीते साथ थे दोनों,
झगड़ा भी कर लेते थे,
यह झगड़ा कितना प्यारा था,
फिर एक-दूजे के हो जाते थे,
माँ-बाप भी देखकर इन दोनों को,
खुश होते वह दोनों थे।
पापा के साथ स्कूल जाते थे,
मम्मी के साथ आते थे,
साथ ही खाते साथ ही पीते,
खाते-पीते मस्त थे दोनों।
झगड़ा जब दूजे से होता,
मिलकर लड़ जाते थे,
पापा की डाँट सुनते रहते,
पर मार कर उसे दम लेते थे।
समझाते एक-दूजे को थे,
भाई तुम यहाँ गलत थे,
तुम्हें यहाँ न यह करना था,
ऐसा नहीं ऐसा करना था।
पढ़ने-लिखने में अच्छे थे,
नौकरी पा गये जल्दी ही,
ऑफिस जाते माँ-बाप से मिलकर,
आने पर भी मिल लेते थे।
फिर दोनों की शादी हो गई,
व्यस्त यह दोनों होने लगे थे,
समय बँटा अब तीन हिस्सों में,
पत्नी, माँ-बाप और ऑफिस में।
फिर इनकी सन्तानें हो गयीं,
जरूरत इनकी बढ़ने लगी थी,
समय भी अब घटने लगा था,
माँ-बाप दूर होने लगे थे।
समय एक बुरा सा आया,
माँ-बाप चलते बने थे,
इनके बच्चें बढ़नें लगे थे,
खेलने-कूदने-हँसने लगे थे।
पहले वाली बात न रह गई,
दोनों परिवार बँटनें लगे थे,
अलग ही खाते अलग ही पीते,
अपने परिवारों में सीमित हो गये।
मकान जो माँ-बाप ने बनाया,
कर लिया उसका बँटवारा,
बीच में दीवार आ गई,
तेरे और मेरे घर में।
इनकी दूरी बढ़ने लगी थी,
बोल-चाल भी बन्द हो गयी,
मिलने को कौन कह सकता,
एक-दूजे को देख नहीं सकते।
गैरों को अपना बनाकर,
दुश्मन हो गये दोनों भाई,
कैसा यह आ गया जमाना,
भाई से भाई नहीं मिलता।
हे भगवान,
मुझे बचाना,
मुझको ऐसी बुद्धि न देना,
माँ-बाप के अरमानों पर,
मुझको नहीं है पानी फेरना।।