Thursday, August 15, 2019

हम न भूलेंगे

हम न भूलेंगे 

love couple in moon light


राकेश और ममता बचपन में साथी थे, साथ ही खाते-पीते थे। यदि कोई दूसरा बच्चा इनमें से किसी से बात भी करता तो जाने क्यों दूसरा चिढ़ जाता था। इन्हें दूसरे बच्चे का यूं बात करना पसंद नहीं आता था। यदि कोई मार भी खाता तो कष्ट दूसरे को होता था। एक दिन किसी बच्चे ने ममता को कुछ कह दिया वह रोने लगी तो राकेश उस बच्चे से भिड़ गया मार कर ही उसने दम लिया। दिन बीतते गये दोनों की उम्र बढ़ती गई, दोनों बड़े होते गये किशोरावस्था लाँघ कर जवान हो गये, साथ ही बढ़ती गई इनकी प्रगाढ़ता, न जाने कब दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया पता नहीं चला।
दोनों एक-दूसरे को जी जान से चाहने लगे। घर वाले जब तक इनकी दोस्ती का बदला रूप समझते बहुत देर हो चुकी थी। दोनों प्यार की सीमा समझते थे।इनका प्यार उस सीमा के अंदर ही रहता था। कभी भी वह सीमा लाँघने की कोशिश नहीं की।लेकिन यह समाज है ऊँगलियां उठने लगीं। परिवार वालों ने दोनों पर बंदिशें लगानी शुरू कर दीं। ममता घर में नजरबंद तो राकेश परेशान, वह ममता से मिलने की कोशिश करता लेकिन ममता के घर वालों की नजर देखकर हिम्मत नहीं कर पाता था।
इधर राकेश के बाबा समझदार व्यक्ति थे।दोनों की दशा समझ रहे थे।उन्होंने एक दिन राकेश से खुलकर बात की, राकेश ने साफ-साफ कह दिया, "मैं ममता के बिना नहीं रह सकता।"
बाबा ने समझाया, "कम्बख्त, उसे इतना ही चाहता है तो कुछ दिन के लिये उसे भूल जा। पहले कुछ बनने की कोशिश कर, मैं वादा करता हूॅ कि तेरी शादी उसी से करवा दूंगा।लेकिन उसके लिए तुझे कुछ बन कर दिखाना होगा।"
राकेश ने यह चुनौती स्वीकार कर ली।
दूसरे दिन शाम को बाबाजी राकेश के पिताजी को साथ लेकर ममता के घर गये। पहले उसके घर वालों ने मिलने से इंकार कर दिया। लेकिन बाबाजी की उम्र का लिहाज करते हुए ममता के पिताजी बात करने को राजी हुए।घर में बैठाया और प्रश्न भरी नजरों से देखा।बाबाजी शालीनता से बोले, "केशव, तुमने और माधव (राकेश के पिताजी) ने बचपन से ध्यान नहीं दिया।बच्चे जब एक-दूसरे को जानने-समझने लगे तो यह पाबंदियां क्यों? बच्चों की गलती कम तुम दोनों की अधिक है।"
अब केशव तथा माधव जी एक-दूसरे को देखने लगे।
तभी बाबाजी बोंले, "केशव,  ममता को थोड़ा बुला दो।"
बुजुर्ग की बात केशव टाल नहीं पाये।ममता आई तो बाबाजी ने उसे पास बैठाया। बोले, "बेटा, स्पष्ट शब्दों में उत्तर देना।यह राकेश और तुम्हारी जिन्दगी का सवाल है।"
ममता जमीन देखती रही।
बाबाजी ने सीधा प्रश्न किया, "राकेश को तुम कितना चाहती हो? वह तो कुछ करता नहीं।मेरी एक सलाह है यदि तुम दोनों कुछ बन कर दिखाओ तो मानूं, और रही शादी की बात तो उसे मैं करवा दूंगा।"
ममता कुछ देर सोचती रही फिर अपने पिता केशव को देख कर केवल यही बोली, "ठीक है बाबाजी, हमें आशिर्वाद दीजिए।"
फिर राकेश और ममता ने मिलना छोड़ दिया बस इसी आशा में कि यदि हमारा प्यार सच्चा है तो हम कुछ बनकर रहेंगे।आखिरकार दोनों की चार साल की अथक मेहनत रंग लायी, राकेश इंजीनियर तो ममता डॉक्टर बन गयी।
एक दिन बाबाजी ने केशव और माधव जी से पूछा, "अब क्या विचार है?"
दोनों कुछ न बोल पाये।बाबाजी ने कहा,"जवान बच्चों को पाबंदी लगा कर नहीं रोक सकते, अतः शर्त रखो कि वे भविष्य बनाने के साथ-साथ अपनी इच्छा भी पूरी कर सकें।"

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव

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Wednesday, August 14, 2019

हमारा तिरंगा


हमारा तिरंगा

15 अगस्त  1947 को जो तिरंगा,
लाल किले पर फहराया गया होगा,
कितना प्यारा कितना खुश रहा होगा,
झूम-झूम कर मचल-मचल कर,
अपनी शान दिखाया होगा।
अपनी सुंदरता से उसने,
भारत की शान बढ़ाई होगी,
उतार कर फिरंगी झण्डा,
खुद चढ़ा उसकी छाती पर होगा।
अब तिरंगा भारत की,
आन-बान-शान बना हुआ है,
उसके सम्मान में हर भारत वासी,
नत मस्तक रहता है।
अपना राष्ट्र गान भी ऐसा है,
इसकी शान बढ़ाता है,
आओ भारत माँ के सपूतों,
तिरंगे का सम्मान करें।
       जय हिंद
     वन्दे मातरम्
 भारत माता की जय।


संस्कार

अजय की शादी हुए पाँच साल हो गए थे।किन्तु संतान का मुंह न देख पाये।कई मनौतियां मनाई कई देवी-देवता पूजे लेकिन संतान पर जैसे भगवान ने रोक लगा रखी थी।बेचारे डाक्टरों के पास दौड़े लेकिन परिणाम ढाँक के तीन पाँत सिफर।परेशान हो गए।पत्नी की बहुत इच्छा थी संतान को गोद खिलाने की।अजय की माँ पोते की आशा लगाये ही दुनिया से उठ गईं।पिताजी पोते की आशा में अभी तक जिन्दा हैं।पास-पड़ोस वाले चर्चा करनें लगें।चार औरतें जहाँ जुटतीं यही चर्चा करतीं।अजय की पत्नी नीलम भी अन्दर ही अन्दर घुटती रहती।
थक-हार कर अजय ने अनाथालय से बच्चा गोद लेने का विचार बना डाला।नीलम को बताया तो थोड़ा न नुकुर के बाद वह तैयार हो गई।पिताजी ने विरोध तो किया लेकिन अजय अपने निर्णय पर अटल रहे।
पिताजी बोलतें,"न जाने क्या कर रहे हो।न जाने किस जाति का लड़का मिले।"
अजय कहते,"पिताजी,चाहे जिस जाति का हो।पालन-पोषण हमें करना है इसलिए उसकी जाति भी हमारी हो जायेगी।"
पिताजी के विरोध के बावजूद अजय अनाथालय से एक बच्चा गोद ले आये।पिताजी ने अजय से बात करना ही छोड़ दिया।नीलम बच्चे में व्यस्त हो गयी।वह एक भली पढ़ी-लिखी अच्छे परिवार की लड़की थी सो बच्चा भी अच्छे संस्कार सीखने लगा।अजय को पापा और नीलम को मम्मी कहने लगा।अजय के पिताजी को बाबा कहता लेकिन वे उससे दूर ही रहते।घृणा करते।चूंकि अजय तथा पत्नी नीलम उनकी मानसिकता समझते थे इसलिये उनकी बातों का ध्यान नहीं देते थे।बच्चे का नाम रखा गया,"सुयश"
बड़ा अच्छा लगता था तथा पढ़ने में भी बहुत तेज।इन सबके ऊपर अजय तथा नीलम द्वारा उसे दिये जा रहे अच्छे संस्कार सोने में सुहागा साबित हो रहे थे।लेकिन पिताजी को पोता न होने का कष्ट बना रहा।दिन बीतते गये लड़का बड़ा होता गया।जैसा नाम वैसा ही काम। वह स्कूल जाने लगा तो बाबा का पैर छू कर जाता।स्कूल से आने पर भी छूता था।रात में सोने जाते समय,"बाबा,गुड नाइट " जरूर कहता।कोई प्रश्न समझ में नहीं आता तो बाबा से पूछता।आखिर अजय के पिताजी बुजुर्ग व्यक्ति हैं बच्चे से दूर कहाँ रह सकते थे ऊपर से उसके संस्कारों ने तो जादू कर दिया।सुयश बाबा के करीब होता गया।
कैसे?
पिताजी भी नहीं समझ पाये।एक दिन अजय ने किसी बात पर सुयश को एक थप्पड़ जड़ दिया।बच्चे के रोने की आवाज सुनकर अजय के पिताजी आ गये।उसे गोद में लेकर दुलारते हुए बोला,"खबरदार जो मेरे पोते को आइन्दा मारा।"
अजय तथा नीलम की ऑखों में ऑसू आ गये और खुशी का ठिकाना न रहा।उन्हें यह भी पता न चला कि यह सब बच्चे को उनके द्वारा दिये गये संस्कारों के कारण ही सम्भव हुआ है।