Wednesday, August 28, 2019

यमराज आये घर मेरे

यमराज आये घर मेरे
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Yamraj

यमराज आये घर मेरे,
हैरान परेशान पसीने से तरबतर,
जाड़े का मौसम था,
लोगों ने दौड़ाया था।
मैं बोला,
"महाराज,
आप यहाँ,
क्यो पधारे हैं,
यहाँ तो कोई मरने को तैयार नहीं है,
फिर क्या करने आयें है?
जाड़े के इस मौसम में,
ऊनी वस्त्र भी नहीं पहनें हैं,
फिर भी पसीने-पसीने,
क्यों हो रहें हैं?"
यमराज बोले,
"किसी की मौत को छोड़ो
अभी तो अपनी जान के लाले पड़े हुए हैं,
तुम्हारी इस पृथ्वी से दूत मेरा,
न जाने किसे ले गया है,
उसने यमलोक को नरक बना दिया है।
लगता है कोई नेता है,
पहुंचते ही उसने चुनाव करवा दिया,
जीत कर चुनाव को,
खुद यमराज बन बैठा है,
अब मुझ हारे प्रत्याशी की पुरानी फाइलें देख रहा है,
मैंने कितने गबन किये हैं,
उनको भी खोज रहा है,
जेल जाने से मैं डरता हूॅ,
भाग कर पृथ्वी पर आया हूॅ।
यहाँ पर तो यह हालत है,
देखा लोगों ने मुझको,
चिल्ला पड़े,
'इसने ही मेरे भाई को मारा,
इसने ही मेरे बाप को मारा'
और दौड़ा लिया मारने को,
अब मेरी जान के लाले पड़े हुए हैं,
और मैं मारा-मारा फिर रहा हूॅ।"

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
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Tuesday, August 27, 2019

मैं पहुंचा चित्रगुप्त के द्वार

मैं पहुंचा चित्रगुप्त के द्वार

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Chitra gupt
Chitragupt

मुझे,
अपने कर्मों का लेखा-जोखा देखना था,
पहुंच गया चित्रगुप्त के द्वार,
मैंने देखा भीड़ वहाँ पर,
मेरे तो छक्के छूट गए।
लोग पसीने-पसीने हो रहे थे,
मैं हैरान रह गया,
दरबान से बोला,
"कितनी भीड़ है यार,
अन्दर जाना तो मुश्किल है? "
वह बोला,
"यह नरक द्वार है,
ऐसी ही भीड़ होती है।
मानव जाति ऐसी कुकर्मी,
मरती है,
और,
यहाँ पर वेटिंग लिस्ट में पड़ती है,
इससे अधिक भीड़ तो अन्दर है,
कुछ को दाखिला मिल गया है,
कुछ वेटिंग लिस्ट में अभी पड़े हैं।
यह तो अभी-अभी आये हैं,
फार्मेल्टी निभा रहे हैं,
वह देखो,
वह स्वर्ग द्वार है,
अब बिलकुल खाली रहता है।
नहीं तो,
सतयुग में यही हालत वहाॅ की थी,
कलियुग क्या आया,
सारी भीड़ यहीं चली आई।"
मैं जीता-जागता मनुष्य था,
आदत से मजबूर था,
दरबान को धोखा देकर,
स्वर्ग द्वार से,
चित्रगुप्त के पास पहुंच गया।
बिजी थे बेचारे,
सर उठाने की भी फुर्सत नहीं थी,
बोले,
"अगला"
मैं बोला नहीं,
पर,
परिचय की पूरी लिस्ट थमा दिया,
उन्होंने सब देख डाला,
आधार, पैन कार्ड तथा वोटर आई डी,
राशनकार्ड, पासपोर्ट, बिजली का बिल,
पानी का बिल,टेलीफोन का बिल,आदि-आदि,
और संतुष्ट हो गये।
मेरा बहीखाता खोला,
बोले,
"तूने केवल पाप किये हैं,
पुण्य का तो नामोनिशान नहीं है।"
मैं बोला,
"बिल्कुल गलत है,
दो-तीन पुण्य भी किये हैं मैंने।"
वे बोले,
"तेरे उन पुण्यों ने,
तेरे कुछ पापों को धो दिया है,
तू तो घोर नरक में जायेगा।"
मैं बोला,
"मैं यह देखने आया हूॅ,
पुण्य कितने किये हैं मैंने,
और ब्याज सहित कितने होतें हैं,
अजी,
छोड़िये मेरे पापों को,
उन्हें दूसरे के खाते में डाल दीजिए,
तथा उपाय और बतायें,
जिससे मेरे पुण्य बढ़ जायें,
ये चुपके से ले लीजिए,
पूरे पचास हजार हैं,
लेकिन नर्क में मत डालिए।
पृथ्वी पर तो यह खूब चलता है ,
बाबू हो या अधिकारी हो,
ऐसे ही काम करतें हैं।"
गुस्से में उन्होंने,
सर उठा कर देखा,
फिर चिल्लाये,
"यह जीवित मनुष्य कैसे आया है,
भ्रष्टाचार फैला रहा।"
दरबानों ने मुझे उठा कर फेंका,
मैं सीधा बिस्तर पर गिरा,
सोचने लगा,
आखिर,
मैंने क्या गलत कर डाला,
कि,
चित्रगुप्त जी नाराज हो गए,
पृथ्वी पर,
बाबू और अधिकारी,
सभी तो रिश्वत खातें हैं।

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                       चित्रकार
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एक चित्रकार जिस वक्त कोई चित्र बनाता है चाहे काल्पनिक हो या किसी को दिमाग में रखकर।वह चित्र बनाते समय चित्र में ही खो जाता है।उस समय वह किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं करता बल्कि एकाग्र चित्त होकर चित्र में रंग भरने में व्यस्त रहता है।निश्चित है कि उसका दिमाग बँटा नहीं कि चित्र को मनचाहा रूप नहीं दे पायेगा चित्र बिगड़ भी सकता है।उस समय उसके दिल का कष्ट तथा दिमाग की उलझन वही समझ सकता है दूसरा कोई नहीं।
ठीक इसी प्रकार यह हमारा जीवन एक चित्र है और हम इसके चित्रकार।यह चित्र हमें ही बनाना होता है।जीवन चित्र बनाने वाले को जीवन को बनाने में इतना मशगूल रहना चाहिए कि उसे अपना ही होश नहीं नहीं रहना चाहिए।उसका एक ही लक्ष्य होना चाहिए अपना जीवन संवारना।मैंने तो खुद अपने ऊपर आजमाया है मैं वह चित्रकार हूॅ जो जीवन चित्र बनाते समय चित्र से दिमाग हटा चुका हूॅ और अपना जीवन जैसा कि अब अनुभव करता हूॅ वैसा नहीं बना सका जैसी मेरी इच्छा थी या बना सकता धा।बिगाड़ बैठा।
जीवन चित्र बिगड़ने का एहसास चित्र बनाते समय नहीं होता है।अनुभव होता है तब जब वक्त बीत जाता है।एक उम्र के बाद।जब हम पिछला बीता जीवन याद करतें हैं तो पाते हैं जीवन बनाते समय कहाँ-कहाँ हमने गलत रंगों का उपयोग किया था तब यदि हम संवेदनशील है तो सिवाय पछताने के कुछ नहीं बचता।अन्जाने में ही अपना जीवन बिगाड़ते समय हम गलत रंगों का प्रयोग कर बैठतें हैं और वही बिगड़ा रंग उस समय अच्छा लगता है।बाद में हम जब जीवन चित्र को हकीकत का जामा पहनाने लगतें हैं और जब जामा खुद को ही अच्छा नहीं लगता तब उसे स्वीकार करने के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता है।यही सोचकर कि किस्मत में यही लिखा था।
हमें अपना जीवन चित्र बनाने की कोशिश करनी चाहिए यह सोचकर नहीं कि होगा वही जो किस्मत में लिखा होगा।यदि एक चित्रकार यही सोच ले तो कभी अच्छा चित्र नहीं बना पायेगा।