सभ्यता-------------
सीट पर उन्हें बैठाने के बाद खुद भी बैठ गया।सीट बेल्ट भी उन्हें बाँध दी।अन्य यात्री सुधांशु की इस तन्मयता को आश्चर्य और मनोयोग से देख रहे थे जैसे कोई फिल्म चलती हो।जहाज उड़ने को हुआ तो दम्पति सीटों पर ऐसे बैंठे थे जैसे डर रहें हों।चेहरे पर उलझन और अजूबा साफ नजर आ रहा था।पर सुधांशु उन्हें हिम्मत दिलाते कहता,"बस एक मिनट चिन्ता की कोई बात नहीं।"
ऐसा लग रहा था कि दम्पति खुद का सामंजस्य जहाज में बैठे लोगों नहीं बैठा पा रही थी।हीन भावना से ग्रस्त दम्पति को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।किन्तु सुधांशु किसी की चिन्ता न करते हुए उन्हीं दोनों में व्यस्त था।जिससे दम्पति को ताकत सी मिल रही थी।
उसी समय एक एयर होस्टेज से,जो बहुत देर से यह सब देख रही थी,ने सुधांशु से अंग्रेजी में पूछा,"ये लोग आपके कौन हैं?"
सुधांशु बोला,"मेरे माँ-बाप।"
एयर होस्टेज ने कहा,"लगता तो नहीं कहाँ आप कहाँ ये लोग?"
सुधांशु बोला,"सच में मैडम,ये मेरे माँ-बाप ही हैं।इन पर मुझे गर्व है।इन्होंने ही मुझे इस काबिल बनाया है कि आप इस तरह के प्रश्न कर रहीं हैं।"
जहाज में लोगों की नजरें सुधांशु पर उठ गयी।अपने माँ-बाप के प्रति उसके समर्पण पर वे भाव-विभोर हो गये।
आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव
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