Wednesday, September 4, 2019

प्रेम की भाषा

प्रेम की भाषा
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राम प्रकाश जी की उम्र होगी लगभग ५६ साल की, साधारण परिवार से हैं और ऑफिस में बाबू हैं।बड़ी मुश्किल से कालोनी में मकान बनवा पायें हैं।इनको लक्ष्मण तथा लखन नाम बहुत पसंद है अतः दोनों लड़कों का नाम भी लक्ष्मण व लखन ही रख दिया। बड़े का नाम लखन तो छोटे का लक्ष्मण रखा।लखन कचहरी में पेशकार तो लक्ष्मण बैंक में नौकरी करता है। लखन की शादी भी कर चुके हैं। उसकी पत्नी छोटे कद की है साथ ही कुछ मोटी, कहने का मतलब गोल-मटोल है। लेकिन स्वभाव से बहुत अच्छी मिलनसार, हँस-मुख, दूसरों की कद्र करने वाली, बड़ों को उचित आदर देती है तो छोटों को उनका प्यार, कोई भी मौका हो हर मौके में सबकी सहयोगी, यही कारण है कि घर से लेकर पास-पड़ोस सब जगह पसंद की जाती है, किन्तु किस्मत की मारी शादी के पाँच साल बाद भी बच्चा न जन्म सकी।
लक्ष्मण भी शादी योग्य हो गया था सो राम प्रकाश जी ने उसकी भी शादी कर दी।आज-कल लड़का जे ई हो, बैंक में हो,
रेलवे में हो, एल आई सी में हो अर्थात कुल मिलाकर ऐसी ही सरकारी नौकरी में हो पत्नी के माने में वह किस्मत वाला होता है।लक्ष्मण तो बैंक में है पत्नी सुन्दर मिली। पढ़ी-लिखी भी है, लम्बी छरहरी। सुरभि (लक्ष्मण की पत्नी) ससुराल में रहने लगी तो हर क्षेत्र में अपना एकाधिकार जमाने की कोशिश करने लगी। जेठानी (कमला) की लोकप्रियता उसे पसंद न आती। वह सोचती, "कमला नाटी और मोटी है, मुझसे कम सुन्दर है, मैं अधिक पढ़ी-लिखी हूॅ तब मुझे अधिक प्यार मिलना चाहिए। मेरे में क्या कमी है जो उसे लोग अधिक पसंद करतें हैं?"
यह सोच उसकी कुढ़न में बदलने लगी। सास-ससुर हों या कमला सबसे कूढ़ने लगी। हर सवाल का जवाब उल्टा देने लगी।बात-बात पर गुस्सा उसकी नाक पर रहता, पास-पड़ोस से भी उसके सम्बन्ध बिगड़ते चले गए, धीरे-धीरे वह लक्ष्मण से अलग रहने को कहने लगी। लक्ष्मण टाल जाता था तो मुंह फुला लेती और कई-कई दिनों तक किसी से बात न करती। राम प्रकाश जी और उनकी पत्नी सब देख-समझ रहे थे।
जब बहुत अति हो गई तो लक्ष्मण से एक दिन कह दिया, "बेटा, अब अलग होने में ही भलाई है तुम्हारी भी तथा हम लोगों की भी।क्योंकि बहू का व्यवहार सहा नहीं जाता। कमला को बाँझ कहती है। हम लोगों को भी जो जी में आता है बक देती है।"
लक्ष्मण ने बहुत कोशिश की, कि अलग न हों लेकिन सुरभि की जिद व घर वालों से उसके व्यवहार के कारण उसने अलग ही होने में भलाई समझी। अतः सुरभि के साथ किराये के कमरे में रहने लगा।
एक साल बाद सुरभि गर्भवती हुई। डाॅक्टर को दिखाया तो उसने कहा, "केस बिगड़ा हुआ है, इन्हें आराम की सख्त जरूरत है।"
किसे बुलाया जाये समस्या थी, लक्ष्मण के घर वालों को सुरभि पसंद नहीं करती थी, मायके वालों ने अपनी मजबूरी जता दी।दुबारा डाॅक्टर को दिखाया तो उसने चेतावनी दे दी। थक-हार कर लक्ष्मण ने घर वालों को बताया। सुरभि बोली, "आयेगा कौन वही बाँझ?"
लक्ष्मण ने मजबूरी जताते हुए कहा, "सुरभि, बात समझा करो, चलो मान लेता हूॅ भाभी ही आयेंगी, लेकिन मत भूलो कि मौके पर गधे को भी बाप कहना पड़ता है।"
दूसरे दिन कमला पहुंच गई।पूरा काम संभाल लिया।लक्ष्मण से बोली, "देवर जी, आप अपनी नौकरी देखिए बस।सुरभि को मैं देख लूंगी।"
वह सुरभि की सेवा-सुश्रुषा में लग गयी। सुरभि को काम न करने देती। अबकी डाॅक्टर ने कहा, "हालत में सुधार है।बस बच कर रहिएगा।"
धीरे-धीरे दिन आ गया, सुरभि अस्पताल में भर्ती हो गई, कमला उसके साथ रहती।डाॅक्टर ने कहा, "ऑपरेशन होगा।"
सुरभि घबड़ाई, कमला समझाती , "कुछ नहीं होगा, मैं हूॅ।"
ऑपरेशन से बच्चा हुआ, सुरभि बहुत देर बाद बेड पर आई, होश आने पर बच्चे को देखा, लेकिन कमला को न देखकर बोली, "दीदी कहाँ है?"
कोई समझ नहीं पाया किसे पूछ रही है? वह बोली, "कमला दीदी को पूछ रही हूॅ।"
सभी भौंचक्के रह गए, कमला के लिए सुरभि के मुंह से  "कमला दीदी"  सुनकर, लक्ष्मण ने बताया, "बाहर बैठीं हैं, उन्होंने कोई बच्चा नहीं जन्मा है न इसलिये बच्चे को छूते डर रहीं हैं।"
सुरभि बोली, "बुला दो"  उसकी ऑखों के कोरों से ऑसू बहने लगे।
तभी कमला आ गई, सुरभि ने उसे अपने पास बुला लिया, बच्चे को उसकी गोद में दे दिया, कमला समझ न पाई क्या हो रहा है?
सुरभि बोली, "दीदी, यह बच्चा तुम्हारा ही है।अगर तुम न आती  तो न मैं रहती न यह बच्चा।"
कहकर वह सुबकने लगी, पता नहीं कमला का एक हाथ सुरभि के बालों को कब सहलाने लगा।
उसे पता तब चला जब सुरभि ने कहा, "दीदी क्षमा----------"
आगे न बोल सकी।
कमला ने कहा,"पगली कहीं की।"

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
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Tuesday, September 3, 2019

ममत्व

ममत्व ------------

mother love

ज्ञान प्रकाश ने अपने पिता को नहीं देखा है उसके बचपन में स्वर्ग सिधार गये थे। माँ ने पाल-पोस कर बड़ा किया। अनपढ़-गँवार है बेचारी। इसलिये दूसरों के घर बर्तन माँजती थी और घरों में झाड़ू पोछा लगाकर अपना तथा ज्ञान प्रकाश का भरण-पोषण करती थी। माँ की एक ही इच्छा थी कि ज्ञान प्रकाश को बाप की कमी न खले तथा वह पढ़-लिख कर किसी लायक बन जाये, जी तोड़ मेहनत करती थी। जैसे-जैसे ज्ञान प्रकाश बड़ा होता गया और उसकी पढ़ाई का बोझ उसकी माँ के कंधों पर बढ़ता गया माँ ने और भी घरों में काम पकड़ लिया किन्तु ज्ञान प्रकाश को किसी प्रकार की कमी नहीं होने देती थी, चाहे वह पढ़ाई में हो या कपड़ों की या फिर दोस्तों में सामंजस्य की. हर कमी पूरी करती थी। ज्ञान प्रकाश भी माँ से बहुत प्यार करता था। माँ के ही साथ खाता-पीता।जब तक माँ को सुला नहीं देता सोता नहीं था।
अब ऊपर वाला मेहरबान हुआ तो ज्ञान प्रकाश अच्छी पद की नौकरी पा गया। माँ से सारे काम छुड़वा दिया और अब खुद माँ का ध्यान रखने लगा। समय बीता ज्ञान प्रकाश की शादी एक अच्छे परिवार की लड़की से हो गयी।लड़की आधुनिक विचारों वाली थी और माँ पुराने विचारों वाली। माँ आदत के अनुसार बर्तन माँजने से लेकर घर के सारे करती थी। सीमा(ज्ञान प्रकाश की पत्नी)का विचार था कि सब कामों के लिए एक नौकरानी रख ली जाये।
ज्ञान प्रकाश से उसने कहा तो ज्ञान प्रकाश ने माँ से कहा, "माँ तुमने जिन्दगी भर दूसरे के घरों में काम करके मुझे इस लायक बना दिया है कि मैं घर के कामों के लिए एक नौकरानी तो रख ही सकता हूॅ। तुम्हारी सेवा करने का जो मौका मुझे मिला है उसे मुझसे मत छीनो।"
माँ का कलेजा दूना हो जाता लेकिन कहती, "बेटा, जब दूसरों के घर काम करते मुझे शर्म नहीं आई तो अपने घर का काम करने में क्या आयेगी?"
ज्ञान प्रकाश निरुत्तर हो जाता। उसे ऑफिस आठ बजे जाना होता था जो सीमा के उठने का समय होता था।अतः माँ ही सुबह का नाश्ता व दोपहर का लंच बनाकर उसे ऑफिस भेजती थी। कई बार उसने सीमा को समझाया लेकिन वह सुनती नहीं थी। कहती, "जरूर उस बुढ़िया ने कहा होगा, इसके पहले मैं नहीं उठ सकती थकान दूर नहीं होती।"
ज्ञान प्रकाश माँ को कष्ट न हो कि सीमा उन्हें बुढ़िया कहती है शान्त ही रह जाता।
कुछ दिनों बाद सीमा ने एक बच्चे को जन्म दिया। धीरे-धीरे वह दो साल का हो गया। सुबह से शाम तक बच्चा दादी के पास रहता। दादी बच्चे को गोविन्द कहती जो सीमा को पसंद न था। उसे आधुनिक नाम पसंद था इसलिये बच्चे को टिंकी कहती और चाहती थी यही नाम बच्चे का रखा जाये। किन्तु चूँकि बच्चा दादी से ही अधिक सटा रहता था सो गोविन्द नाम से ही लोग पुकारते। दादी बच्चे को भजन, पुराने बच्चों के गीत सुनाती, कहानी किस्से सुनाती जिन्हें सीमा पसंद नहीं करती। उसका विचार था कि इस तरह तो बच्चा  १८ वीं सदी का हो जायेगा। वह बच्चे को आधुनिक बनाना चाहती थी, सो टीवी पर नये गाने लगाकर कभी डिस्को, कभी ब्रेक, कभी टिप्स डांस सिखाती, जब कभी दादी बच्चे को कुछ सिखाती सीमा बच्चे को बुला लेती।
एक दिन ज्ञान प्रकाश ऑफिस के कामों में अधिक व्यस्त रहा। मानसिक व शारीरिक रूप से थका घर आया तो सीमा ने उससे कहा, "बुढ़िया को समझा दो. बच्चे से दूर ही रहे या फिर मुझे मेरे घर पहुंचा दो।"
एक ऑफिस की उलझन ऊपर सीमा का यह रूख ज्ञान प्रकाश को गुस्सा आ गया।सीमा से कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई तो सारा गुस्सा माँ पर उतार दिया,"माँ इस घर में रहना है तो मेरे और सीमा के अनुसार चलो नहीं तो दूसरा ठिकाना खोज लो।रोज की चिक-चिक से मैं ऊब गया हूॅ-------------‌--"
और भी क्या-क्या कह डाला गुस्से में उसे खुद याद न रहा।
माँ अपने लड़के का यह रूप देख भौंचक्का रह गई।इतना ही बोल पायी,"अब इस उम्र में किसके पास जाऊँ?"
ज्ञान प्रकाश बोला,"भाड़ में जाओ लेकिन यहाँ से जाओ।"
उस रात किसी ने खाना नहीं खाया।गुस्सा ठंडा होने पर ज्ञान प्रकाश बहुत पछताया।माँ ने उसे कैसे-कैसे पाला है याद करने लगा रात भर सो न पाया।पांच-छह बार बाथरूम गया।जब उठता माँ को करवट बदलते देखता।कई बार माँ के पास गया लेकिन वह सोने का नाटक करते हुए ऑखें बन्द कर लेती।लेकिन ऑसुओं को न छुपा पाती।वह भी ज्ञान प्रकाश की एक-एक हरकत देख रही थी।
सुबह ज्ञान प्रकाश को झपकी आने लगी।माँ उठी और उसके सर पर तेल लगाने लगी।ज्ञान प्रकाश ने ध्यान भी दिया पर बोला कुछ नहीं।बहुत दिनों बाद माँ आज सर सहला रही थी।इतना प्यारा स्पर्श पाकर माँ की गोद में सर रखकर सो गया। ।दो घण्टे बाद सोकर उठा।माँ को वैसे ही बैठे देखकर बोला,"माँ तुम हटी नहीं?"
माँ बोली,"बेटा, मैं हटती तो तुम जाग जाते।"
ज्ञान प्रकाश को प्रायश्चित होने लगा।रूऑसा होकर बोला,"माँ मैंने रात में तुम्हें न जाने क्या-क्या कह दिया माफ कर दो।"
माँ बोली,"बेटा, बहू की कोई बात नहीं।दूसरे घर से आई है।उसे मेरे साथ तथा मुझे उसके साथ तालमेल बैठाने में समय लगेगा।तुम तो मेरे शरीर से जन्मे हो।जब तुम कुछ कहते हो
तो मुझे बहुत कष्ट होता है।मैं मर्माहत हो।जाती हूॅ।"
ज्ञान प्रकाश बोला,"माँ, माफ कर दो।आइन्दा से--------------"
इसके आगे वह न बोल पाया।गला रूंध गया।ओंठ काँपने लगे।बस माँ को पकड़ कर बिलख-बिलख कर रोने लगा।उसके रोने में उसका पश्चाताप घुलने लगा।माँ भी रो रही थी उसके ऑसुओं में बेटे के प्रति ममत्व उमड़ रहा था।

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Sunday, September 1, 2019

                          माधवी
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माधवी,
यों तो बदसूरत ही कही जाती थी।साँवली, नैन-नक्श अजीबो-गरीब,दुबली-पतली,गाल पिचके हुए,दाँत बाहर निकले हुए, मोटी आवाज कहने का मतलब वह शारीरिक रूप से कहीं से भी ऐसी नहीं थी जिसे सुन्दर कहा जाता।लोग उसे तिरस्कृत नजरों से देखा करते थे।हालाँकि पढ़ी-लिखी थी,स्वभाव से बहुत अच्छी थी,सबके सुख-दुःख में एक पाँव पर खड़ी रहती थी।किन्तु शारीरिक कुरूपता उसे तिरस्कृत बना देती थी। उसने जीवन यापन के लिए एक प्राइवेट स्कूल में बच्चों को पढ़ाने की नौकरी कर ली और बच्चों को ही अपनी औलाद समझने लगी।जब उसका अकेला पन दूर होने लगा तो उसके चेहरे पर निखार भी आने लगा।शरीर भी हरा-भरा हो गया।दुबली-पतली से वह तन्दरूस्त लगने लगी।
चूँकि स्वभाव से अच्छी थी अतः बच्चों में उसके प्रति लगाव पैदा हो गया।वह भी बच्चों को मन से पढ़ाती।हर बच्चे को वह समान रूप से देखती।वह प्रयास करती कि हर बच्चा एक समान रूप से उसकी बातों को समझे।जहाँ तेज बच्चों को कमजोर होने से बचाती वहीं कमजोर बच्चों को भी तेज करने की कोशिश करती थी।परिणामस्वरूप उसके विषय में हर बच्चा अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होता था।धीरे-धीरे प्रधानाचार्य भी माधवी से प्रभावित होने लगे।
एक दिन एक बच्चा खेलते हुए चोट लगने से विद्यालय में घायल हो गया।माधवी प्रधानाचार्य को सूचित करके उसे विद्यालय के पास वाले अस्पताल ले गयी।बिना किसी का इंतजार किये उसने उसका इलाज करवा दिया।तब तक बच्चे के घर वाले भी पहुंच गए।डॉक्टर से मिलने पर डाॅक्टर ने कहा,"अब यह बिल्कुल ठीक है।वह तो अच्छा हुआ कि(माधवी की इशारा करते हुए)इन मैडम ने समय से इलाज करवा दिया बहुत खून नहीं बह पाया नहीं परेशानी हो सकती थी।"
घर वालों ने डाॅक्टर से खर्च पूछा।डाॅक्टर ने बताया,"दो हजार लेकिन वह सब मैडम ने चुकता कर दिया है"
घर वालों ने कृतज्ञता भरी नजरों से माधवी को देखा और बोले,"मैडम,आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।ये दो हज़ार रुपए जो डाॅक्टर को आपने दिये हैं।"
माधवी बोली,"रहने दीजिए।क्या यह बच्चा मेरा नहीं?"
घर वालों ने बहुत कोशिश की लेकिन माधवी ने पैसे नहीं लिये।जिसके कारण बच्चे के घर वाले बहुत प्रभावित हुए।परिमाण यह हुआ कि दूसरे दिन विद्यालय का नाम अखबारों में आ गया और विद्यालय शहर भर में मशहूर होने लगा।प्रधानाचार्य तो माधवी पर निहाल हो गये।उसकी तरक्की करके विद्यालय का हेड मास्टर बना दिया तथा वेतन में भी वृद्धि कर दी।
कुछ दिनों के बाद माधवी के मोहल्ले की एक बूढ़ी औरत,जिसे वह काकी कहती थी,गुजर गयी।माधवी एक पैर पर उसके परिवार के साथ खड़ी रही।इससे वह उस घर तथा मोहल्ले वालों की चहेती बन गई।इस प्रकार माधवी की मन की सुन्दरता के आगे तन की सुन्दरता लोगों को दिखाई देना बन्द हो गया।