Sunday, September 22, 2019

                          जानें क्यों
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जाने क्यों पापा गुमसुम रहतें हैं?मम्मी गयी साथ में पापा के ओंठो की हँसी और उनकी मुस्कारट को लेंती गयीं।यह बात नहीं कि पापा अब हँसते नहीं।अब भी हँसते हैं लेकिन खोखली हँसी।अब पापा दार्शनिक हो गये हैं।दार्शनिक जैसे बातें करतें हैं।मुझे याद है मेरी शादी के लिए कितने उत्सुक थे पापा।रोज कोई न कोई प्रोग्राम बनाते रहते थे।रीना की शादी में ऐसे करूँगा कि दुनिया देखेगी।मम्मी से हमेशा ही कहते रहते थे,"मेरी तो इकलौती संतान है रीना अपनी पूरी ख्वाहिश पूरी कर लूँगा।"
लेकिन मम्मी का गुजरना जैसे पापा की उत्सुकता को लेता गया।मैं और पापा दो ही व्यक्ति बचे थे घर में।यह नहीं कि पापा ने मेरी शादी में कोई कमी रखी थी।खूब बढ़-चढ़ कर मेरी शादी की है।सभी बारातियों और मेहमानों ने खूब बढ़ाई की थी शादी की।हर इंतजाम की खुल कर वाह-वाही की थी।लेकिन पापा मैंने अनुभव किया कि वह उतने उत्सुक नहीं थे जितना मम्मी के रहते होंते।
मैं ससुराल आ गई वहाॅ पापा अकेले रह गए।मन उन्हीं में लगा रहता।देवेन्द्र ने बहुत कोशिश की बहलाने की लेकिन मन,"पापा-पापा" ही करता रहता।मैं पापा से मिलने का कोई न कोई बहाना खोजती रहती।मेरे ससुराल वालों को बुरा लगना लाज़िमी था।लेकिन "पापा"के आगे कुछ दिखता ही नहीं था मुझे।पापा शुगर तथा हार्ट के मरीज भी थे सो "उन्होंने दवा खाई या नहीं" यह चिन्ता भी मुझे लगी रहती।दिन भर में जब तक तीन-चार बार फोन से बात न कर लेती चैन नहीं होता था।
एक बार सासू माँ बीमार थी और पापा पर शुगर ने अटैक कर दिया।मैंने देवेन्द्र से बहुत कहा कि,"पापा के पास पहुंचा दो।शुगर बढ़ गया है उनका।"
देवेन्द्र कहते,"माँ बीमार है उनको कौन देखेगा?"
मैंने कहा,"तुम जो हो।"
लेकिन देवेन्द्र पापा के पास मुझे ले जाने को तैयार न थे।मैं खुद ही अकेले पापा के पास पहुंच गई।पापा ने मुझे देखा और खोखली हँसी हँसकर बोले," तुम आ गई?अकेले आई हो? देवेन्द्र कहाँ हैं? तुम्हारी सासू माँ कैसी हैं?"
मैंने कहा,"बीमार ही हैं।"
पापा तुरन्त आपे से बाहर हो गए,"तुम्हें बुलाया किसने था?जो यहाँ आ गयी?अपनी सास को बीमार छोड़कर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की?मेरा नाम तुमने डुबो कर रख दिया।क्या सोचते होंगे ससुराल वाले?यही न कि हमने तुमको बाँध रखा है?मेरी मोह-माया से तुम छूट नहीं पाई हो?मुझे तुमसे कोई प्यार-मोहब्बत नहीं है।अभी इसी वक्त उल्टे पाँव अपने ससुराल चली जाओ।सास को देखो।"
पापा का यह रूप देख मैं दंग रह गई।तुरन्त ससुराल लौट पड़ी।आज पापा नहीं हैं।लेकिन उनका सबक मुझे अबतक याद है।
आज मेरे चाचाजी मेरे घर आये थे।पापा की एक चिट्ठी,जो मेरे नाम से थी, दे गये हैं।मैंने चिठ्ठी पढ़नी चाही लेकिन सासू माँ को देखने मुहल्ले की औरतें आ गयीं थीं।अतः चिठ्ठी आलमारी में रख दी।रात को समय मिला तो खोल कर पढ़ने लगी।लिखा था,"प्रिय बेटी,
                    क्षमा करना मैंने तुम्हें डाँटा।मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूॅ।मैंने तुम्हें इसलिये डाँटा था तुम मेरी मोह में ससुराल से अलग हो रही थी जो शादी के बाद तुम्हारा असली घर है---------------------।"

Saturday, September 21, 2019

रिटायर पापा

रिटायर पापा

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retirement

पापा रोडवेज में फोरमैन हुआ करते थे।नौकरी में थे तो हँस-मुख थे। माँ जब वह पचपन साल के थे उनका साथ छोड़कर चलीं गईं, तब से पापा अकेले से पड़ गये। किसी से अपना दुःख-दर्द नहीं कह पाते हैं, अपने मन की बात भी नहीं कहते हैं। ऑफिस की देर होती रहती थी लेकिन भाभी को जल्दी भोजन बनाने के लिए नहीं कहते थे। देर से ही सही ऑफिस जरूर जाते थे। शाम को आते चुपचाप कुर्सी पर निढाल बैठ जाते थे पर पानी नहीं मांगते थे। भाभी ने जब दे दिया पी लेते थे या खुद ही फ्रिज से निकाल कर पी लेते थे। लेकिन साथ में कुछ खाने की उम्मीद भी नहीं करते थे। चाय मिल गयी तो पी लिया नहीं चुप मारकर रह जाते थे। उनकी एक आदत थी जो अब भी है सुबह बासी मुंह गर्म पानी लगभग डेढ़ लीटर पीते हैं फिर उसके बाद एक कप शुद्ध दूध की चाय अपने हाथ से स्वयं बनाकर पीते हैं। माँ थीं तो बराबर ध्यान देती थीं किन्तु जब से वह न रहीं सुबह कभी दूध नहीं मिलता तो कभी चाय बनाने का बर्तन, पापा बिना चाय पिये ही रह जातें हैं। माँ के रहते हुए यदि सुबह चाय के लिए दूध नहीं पाते थे तो हंगामा मचा देते थे लेकिन अब कोई हंगामा नहीं। शायद समय की नज़ाकत समय समझ चुके हैं ।
अब तो पापा रिटायर हो चुके हैं सो दिन भर घर में ही रहतें हैं। भइया के बच्चों के साथ दिन बिताते हैं। कभी-कभी भाभी भी गजब कर देतीं हैं अगर पापा सोये रहतें हैं तब भी बच्चों को उनके पास भेज देतीं हैं। सोने का मन होते हुए भी पापा बिना मन के बच्चों के साथ भारी मन से खेलने लगतें हैं। वैसे तो पापा बच्चों को रोज पार्क में घुमाने ले जातें हैं। लेकिन भाभी का उम्मीद लगाना कि वह घुमाने तो ले ही जायेंगे उन्हें बुरा लगता है। अब बासठ-पैसठ साल के बुजुर्ग से किसी बात की उम्मीद करना बेकार है कि नहीं?
भाभी का यह उम्मीद करना कि वे बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ सब्जी वगैरह ला दिया करें उन्हें बुरा लगता है। वे अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीना चाहते हैं पर भाभी जब कोई काम थोपतीं हैं तो उनका बुरा मानना लाज़िमी है। पापा पढ़ने-लिखने के बहुत शौकीन है सो अक्सर ही कुछ न कुछ पढ़ते-लिखते रहतें हैं उस समय उन्हें अवरोध पसंद नहीं रहता है जब भाभी उस समय भी कोई काम कह देंती हैं तो पापा को कितना कष्ट होता है कोई नहीं समझ सकता।
मेरा तो विचार है कि रिटायर व्यक्ति को अपने मन-मुताबिक दिन-चर्या से रहने देना चाहिए क्योंकि जब वह अपने हिसाब से जियेगा तो ज्यादा खुश रहेगा और लम्बी उम्र जियेगा। उस पर किसी काम को थोप कर उससे कार्य करने को मजबूर करना जहाँ एक ओर उसकी खुशियों को उससे छीनता है वहीं दूसरी ओर उसकी उम्र कम करता है।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव

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Friday, September 20, 2019

                           वैमनस्यता
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"राज ट्रांसपोर्ट कम्पनी"
अपने शहर की मानी-जानी ट्रांसपोर्ट कम्पनियों में से एक थी।कम्पनी के मालिक सरदार मोहिन्दर सिंह जी एक धनाढ्य व्यक्ति थे।उनके अन्य दो भाई सरदार जोगिंदर सिंह तथा सरदार बलविंदर सिंह भी कम्पनी से जुड़े थे।तीनों भाइयों में बहुत मेल रहता था।वैसे भी आदमी लोग पारिवारिक झगड़ें नहीं करते।झगड़े होतें हैं तब जब घर में बहुएं आ जातीं हैं।मोहिन्दर सिंह जी जब तक परिवार में अकेले विवाहित पुरूष थे।तीनों भाइयों में बहुत मेल मेल-मिलाप था।साथ ही खाना-पीना रहता था।मोहिन्दर सिंह अगर किसी भाई को डाँट देते थे तो वह बुरा नहीं मानता था।
लेकिन जब से जोगिंदर और बलविंदर की शादी हुई है।घर में रोज किच्-किच् होने लगी।छोटे भाइयों को लगने लगा कि मोहिन्दर सिंह अधिक से अधिक पैसा लेकर उनको कम पैसा देतें हैं जैसे वे उनके भाई न होकर वेतनभोगी कर्मचारी हों।धीरे-धीरे छोटे भाइयों ने अपनी-अपनी ट्रांसपोर्ट कम्पनियां खोल लीं।भाइयों की इस विभीषण गिरी का परिणाम यह हुआ कि मोहिन्दर सिंह की कम्पनी "राज ट्रांसपोर्ट कम्पनी" को हानि होने लगी।उन्होंने एक-एक कर ट्रकों को बेचना शुरू कर दिया।कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी।अन्त में उनके पास एक ट्रक और चार वफादार ड्राइवर ही रह गए।बाकी सभी कर्मचारी चले गए।चारों ड्राइवर चार धर्म के थे हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई।
चारों एक-एक कर ट्रक चलाते थे।हिंदू हमेशा "हनुमान जी" की फोटो ट्रक में लगाता था।जब कि मुस्लिम "अल्लाह"की,सिक्ख "वाहे गुरु" की और ईसाई "क्रास" की।चारों एक-दूसरे की तस्वीर पसंद नहीं करते थे।जो ड्राइवर ट्रक चलाता था ट्रक में अपने भगवान् की तस्वीर लगा लेता था।यदि कोई ड्राइवर किसी कारण वश तस्वीर उतारना भूल जाता था तो दूसरा उसे उतार कर एक कोने में डाल देता था।तस्चीर  चारों ड्राइवर में वैमनस्यता का कारण बनती चली गई।उन्होंने ट्रक को भी मेनटेन रखना छोड़ दिया।नतीजा यह हुआ कि एक तस्वीर के कारण ट्रक बर्बाद हो गई और चारों ड्राइवर में बोलचाल बन्द होने लगी।