तकरार
----------------
लेकिन यह कह कर कि, "सौतेली माँ बच्चों से कैसा व्यवहार करे पता नहीं" सो दूसरी शादी नहीं की।
उनका सब्र और त्याग रंग लाया। राम विजय नौकरी में आ गया। किन्तु रवि विजय बी एस सी में पढ़ता था।तभी अकाल मृत्यु ने बाप को आ घेरा और वे पत्नी के पास चले गए। अब राम विजय की शादी अवश्यंभावी हो गई। राम विजय पर अपनी जिम्मेदारी के साथ-साथ रवि विजय की जिम्मेदारी आ गई। हालाँकि रवि विजय होशियार था कभी कोई चीज नहीं माँगता था लेकिन अपनी भी जिम्मेदारी कुछ होती है। इसलिए राम विजय उसका बहुत ध्यान रखता माँ-बाप की कमी को पूरा करने की हर संभव कोशिश करता। आखिरकार राम विजय ने शादी कर ही ली।
पत्नी से बोला,"मेरी एक ही इच्छा है कि रवि को माँ-बाप की कमी न खले। अब हम लोग ही उसके माँ-बाप हैं।बस वह किसी प्रकार अच्छी नौकरी पा जाये।"
पत्नी के मायने में राम विजय किस्मत वाला निकला, पत्नी क्या थी बिल्कुल लक्ष्मी थी। रवि को माँ बनकर मानती थी। धीरे-धीरे रवि की पढ़ाई पूरी होती गयी। नौकरी भी ऊँचे पद की पा गया। जबकि राम विजय बाबू ही था। रवि की नौकरी से सबसे अधिक खुशी राम विजय को ही हुई। घर पर जान-पहचान वालों की एक शानदार पार्टी कर डाली। जैसे कोई सपना पूरा हो गया हो।
समय पर रवि की शादी एक अच्छे परिवार की लड़की से कर डाली। रवि की पत्नी तेज निकली। जेठानी और जेठ का बंधन उसे पसंद नहीं था। जबकि राम विजय और उसकी पत्नी ने रवि तथा उसकी पत्नी को हर प्रकार की छूट दे रखी थी परन्तु रेखा(रवि की पत्नी) को उनकी छत्रछाया में रहना ही पसंद नहीं था। रवि से अलग होने को कहने लगी। लेकिन रवि तो भइया-भाभी के रंग में ऐसा रंगा था जैसे "काली कम्बल" हो दूसरा रंग चढ़ता ही नहीं था।
आखिर रेखा ने एक उपाय निकाला। वह सुमन (राम विजय की पत्नी) से झगड़ा करने लगी। सुमन सीधी-सादी औरत थी सो झगड़ा जानती ही नहीं थी। इसलिए रेखा खिसिया कर रह जाती।
इधर चूंकि रवि का पद पैसा कमाने वाला था अतः उच्च पदस्थ अधिकारी ने पैसे में हिस्सेदारी माँगनी शुरू कर दी। किन्तु रवि ठहरा एक सीधा-सादा तथा अच्छे संस्कारों में पला लड़का, न तो ऊपरी कमाई करता और न ही उच्च पदस्थ अधिकारी को कुछ देता। वह अधिकारी रवि को परेशान करने लगा। रोज रवि के ऑफिस का निरीक्षण करने लगा कामों तथा रिकॉर्डों में कमी खोजने लगा।साथ ही निलंबित करने की धमकी देने लगा।परेशान हो कर रवि ने घर पर सबकुछ बता दिया।
पत्नी बोली, "यार रवि, तुमको तो १८वीं सदी में पैदा होना चाहिए था। अरे,जी भर कमाओ और बाँटो।खुल कर जीओ जमाना यही है।"
राम विजय और सुमन कहते, "नहीं,ईमानदारी से काम करो, जो होगा देखा जायेगा, ईमानदारी जीतेगी, अभी तो हम दोनो हैं, चिन्ता किस बात की?"
भइया-भाभी की बातें रेखा की बातों से वजनी थी। रवि ईमानदारी से काम करता रहा। आखिरकार अधिकारी ने उसे निलंबित कर दिया। इस निलंबन के दौरान राम विजय और सुमन ने उसे कोई कमी नहीं होने दी। रेखा ने बच्चा जन्मा पूरा खर्च उन दोनों ने उठाया। एक दिन मुख्यालय से सबसे बड़ा अधिकारी रवि के आवेदन पर उसके निलंबन की जांच करने आया। उसने जाँच के दौरान रवि के कामों की तारीफ की, उसे फिर से बहाल कर दिया जबकि उच्च पदस्थ अधिकारी को "कारण बताओ नोटिस" जारी कर दिया। इन सबका रेखा पर ऐसा असर पड़ा कि उसने जेठ-जेठानी से माफी माँग ली और कहा, "आप मेरे जेठ-जेठानी ही नहीं मेरे माँ-बाप हैं।"
आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव
ऐसे ही और कहानियां पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

No comments:
Post a Comment