Monday, September 23, 2019

औलाद

औलाद
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Aulaad

ईश्वर का दिया सब कुछ था राम नाथ जी के पास, माँ-बाप का मकान, धन-दौलत-वैभव सब कुछ था। नहीं थी तो एक औलाद। बेचारे कहाँ-कहाँ नहीं दौड़े। कितनी मनौतियां नहीं मनाई लेकिन सब बेकार, थक-हार कर औलाद होने की उम्मीद छोड़ बैठे थे, न जाने किसकी दुआओं से उसके घर में किलकारियाँ गूँजी कि एक पुत्र रत्न की प्राप्ति उन्हें हुई। चूँकि शादी के बारह साल बाद पुत्र प्राप्त हुआ था उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। खूब बड़ा भोज किया, शहनाई बजवायीं।
पुत्र दिन-ब-दिन बड़ा होता गया, बाबा-दादी का भी प्यारा था। वे अपनी ऑखों से ओझल नहीं होने देते थे उसे। जहाँ जाते अपने साथ ले जाते। खूब लाड़-प्यार करते थे। हर जिद पूरी कर देते थे। नतीजा वही हुआ जो माँ-बाप के कन्ट्रोल के बिना होना था। पुत्र जिद्दी हो गया। अब तो यह बात सत्य है कि माँ-बाप के साथ संतान जितनी अनुशासित रहेगी किसी और के साथ नहीं रह सकती केवल अपने चाचा को छोड़कर। बाबा-दादी, नाना-नानी तो बच्चे को दुलार करेंगे ही, लड़का हाईस्कूल पास करके इण्टर में पहुंच गया तो जिद्दी होने के साथ-साथ महत्वाकांक्षी भी हो गया।
लोगों ने इंजीनियरिंग की कोचिंग करने की सलाह दी, पर लड़के की इच्छा थी कि कोचिंग तो करेंगे ही लेकिन बाइक से जाऊँगा और उसी से वापस आऊँगा। पन्द्रह-सोलह के लड़के को बाइक न देना ही उचित समझा गया अतः बाइक नहीं दी गई।लड़के को हर जिद पूरी करवाने की आदत थी लेकिन यह जिद पूरी न होते देख अवसाद में चला गया। माँ-बाप से बोलना छोड़ दिया अकेले ही रहता। बहुत दवा की गई तब अब ठीक है लेकिन देर हो चुकी थी नौकरी के लिए उम्र सीमा समाप्त हो चुकी थी।
राम नाथ जी चिन्ता में डूबे रहते हैं लेकिन उनकी पत्नी अब भी लड़के के ऊपर मरी जातीं हैं। मकान है तो दस कमरे का ऑगन है, पोर्च है यानि मकान में सब कुछ है, पर राम नाथ जी के तीन भाई और हैं। जिनके हिस्से पर भी उनकी पत्नी ऑख गड़ाये बैठीं  थीं। न तो राम नाथ जी, न पत्नी लड़के के बारे में कुछ सोचतें हैं। न ही लड़का अपने बारे में कुछ सोचता है। राम नाथ जी के बाद माँ-बेटे का गुजर कैसे होगा ईश्वर ही जाने।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव

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                      बच्चें तो बच्चें ही होते हैं
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घटना बिल्कुल सत्य है।मेरी ऑखों देखी है इसमें कुछ भी नहीं जोड़ा या घटाया नहीं गया है।मैं प्रयागराज में रहता हूॅ इसलिये कुम्भ मेला देखने का अवसर मिलता ही रहता हूॅ।इस मायने में मैं खुशकिस्मत हूॅ।वैसे यह मेला हर साल लगता है लेकिन छोटे रूप में जिसे "माघ मेला" कहतें हैं।हर बारह साल बाद पूर्ण कुम्भ लगता है।लेकिन बीच में छः साल बाद अर्द्ध कुम्भ मेला लगता है।इस मेले की अहमियत वही जान सकता है जो मेले में आया हो।हर ओर भक्ति का आलम।साधु-संतों की भीड़।विदेशी सैलानियों तथा भक्तों का जन सैलाब।केवल कल्पना ही की जा सकती है।कहते हैं समुद्र-मंथन के बाद अमृत की कुछ बूंदें यहाँ गंगा-यमुना-सरस्वती के तट पर गिर पड़ीं थीं अतः इस मेले में तीनों पवित्र नदियों के संगम में स्नान करने से सारे पाप धुल जातें हैं।एक ओर अकबर का किला है तो दूसरी ओर लेटे हुए हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है।किले में अक्षय वट है कहतें हैं पहले ऋषि-मुनि इस पर से यमुना में छलांग लगा देते थे तो सीधे स्वर्ग पहुंच जाते थे।यह बात सच है या गलत मैं नहीं जानता लेकिन ऐसी किवदंती है।
हाँ तो,
इस बार भी मैं अर्द्ध कुम्भ मेला घूम रहा था परिवार के साथ था।अचानक मेरी नजर एक आधुनिक और अप टू डेट दम्पति पर पड़ी।जिसके साथ दो बच्चें थे एक चार-पाँच साल का लड़का और एक लड़की आठ-दस साल की।लड़का दम्पति की तरह अप टू डेट था जब कि लड़की बहुत ही साधारण यहाँ तक कि हवाई चप्पल पहने थी।दम्पति लड़की से ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसे वह उनकी नौकरानी हो।एक जगह एक गुब्बारे बेंचने वाला गुब्बारा बेंच रहा था।लड़के ने जिद की तो दम्पति ने लड़की से एक ही गुब्बारा मंगवाया।लड़की गुब्बारे से खेलने लगी तो लड़के की माँ तुरन्त डपट पड़ी,"पगली गुब्बारा टिंकू के लिए मंगवाया है तेरे लिए नहीं।चल टिंकू को दे दे।दुष्ट कहीं की।"
लड़की ने गुब्बारा लड़के को दे दिया लेकिन हसरत भरी नजरों से गुब्बारे को देखते रह गई।मैंने भी अचरज से दम्पति को देखता रह गया।सोचा एक गुब्बारा लड़की के लिए भी खरीद दूं।लेकिन दम्पति बुरा न मान जाये इस डर से नहीं खरीदा।मन मसोस कर रह गया।सोचने लगा,"बच्चें तो बच्चें ही होंते हैं।फिर इतना अन्तर क्यों?"

Sunday, September 22, 2019

                         दुःख है इस बात का
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मुझे दुःख इस बात का नहीं,
कि,
लोगों ने धोखा दिया,
दुःख तो इस बात का है,
कि,
अपनों ने ही धोखा दिया।
जिन्हें समझता था अपना,
वह पराये हो गये,
और,
जो पराये थे,
पराये ही रह गये।
न पराये अपने हो सके,
न अपने ही अपने रह सके,
जाने क्या कमी है मुझमें,
किसी को न अपना कर सका।
अगर हो पता तुम्हें,
तो,
मुझमें ऐसी क्या कमी है,
कि,
हर व्यक्ति मुझसे पराया हो गया,
बता दो मुझे ऐ दोस्त,
कमी अपनी दूर कर सकूं।