Thursday, November 21, 2019

                   यही बनारस है
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जी हाँ,
भगवान् शिव के त्रिशूल पर टिकी,शेष नाग के फन पर बसी यही गलियों और मन्दिरों की नगरी काशी है।काशी यानी बनारस वरूणा तथा अस्सी नदियों के बीच की नगरी वाराणसी।धर्म का अवलम्ब,हिन्दू संस्कृति की पहचान है।गलियों में बनी बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं को देखकर आप अचम्भित रह जायेंगे जिन गलियों में साइकिल बाइक मुश्किल हो उनमें बड़ी वाहनों से अट्टालिकाओं के लिए सामान लाना आश्चर्य जनक है।कई किलोमीटर तक गंगा किनारे पक्के घाटों का होना आश्चर्य में डाल देता है।काशी की सुबह शिव शंकर से शुरू होती है।सैलानिओं की भीड़ देखते ही बनती है।सबका मकसद एक "हिन्दू संस्कृति का अध्ययन"
यहाँ श्मशान घाट हैं एक,"हरिश्चंद्र घाट"दूसरा "मणिकर्णिका घाट"।

Tuesday, November 19, 2019

                    एकाकी जीवन
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 मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।एकाकी जीवन कैसा होता है उसे तब पता चलता है जब वह एकान्त वास में पड़ता है।तब वह समझ सकता है एकांत वास कैसा होता है।जब उसके पास कोई काम न हो जब बात करने वाला भी कोई न हो।वह अकेला हो एक दम अकेला।जी हाँ बात कर रहा हूॅ अपनी।घर में हूॅ।पहले  18 सदस्यों का परिवार था।ईश्वर की माया कहें या कोप पाँच ही सदस्य परिवार में हैं इस समय।जिसमें से भी दो सदस्य अस्पताल में हैं एक बिमारी के कारण भर्ती हैं दूसरा उनके सहायक के रूप में रहता है।छोटा भाई ड्यूटो पर तो भतीजा घर अस्पताल एक किये रहता है।अब घर में बचें तीन सदस्य।दो औरतें एक मैं खुद।न बोलने वाला कोई न चालने वाला कोई घर में अकेला बैंठे-बैंठे अब समझने लगा हूॅ अकेलापन कैसा होता है।

Monday, November 18, 2019

             टूटता-बिखरता परिवार
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भगवान् भी एक हँसते-बोलते परिवार को कैसे बिखेर देता है।देखिए तो।श्यामा नन्द जी ने दस कमरे का मकान बनवाया।उनके परिवार में उनकी माँ,चार लड़के,उनकी बहुएं,चार पोते और एक पोती यानि कुल  18 सदस्यों वाला बड़ा परिवार था।सोचा,"सभी मिलकर रहेंगे।"लेकिन भगवान् को कुछ और ही मंजूर था।पहले माँ गिरीं कमर की हड्डी टूट गई।दों साल बिस्तर पर रहने के बाद स्वर्ग सिधार गयीं।
फिर बड़ा पोता अंजानी बिमारी से मर गया।अभी उसका गम भूले नहीं थे कि दूसरे नम्बर का पोता भी उसी बिमारी से मर गया।उनके बड़े लड़के ने दौड़-धूप कर अपनी बेटी की शादी कर डाली।शादी के कुछ ही दिन बाद सबसे छोटी बहू कैंसर से मर गयी।जिसके कुछ दिनों के बाद पत्नी ने बुढ़ापे के कारण दम तोड़ दिया।फिर बड़े लड़के और उसकी पत्नी ने कैंसर के कारण अन्तिम साँसें ले लीं।बेचारे अभी गम भूले भी न थे कि खुद  92 साल की उम्र में स्वर्ग सिधार गये।
तीसरा लड़का बाहर रहता है।उसके दो लड़के भी बाहर नौकरी करतें हैं।सबसे छोटा पोता भी बाहर ही रहता हैं।दूसरे नम्बर का बेटा भी शरीर में इन्फेक्शन के कारण चलता बना।इस समय उनके दस कमरे के मकान में सिर्फ चार ही लोग रहतें हैंं।
यह माया है भगवान की कि  18 सदस्यों के परिवार वाले मकान को चार सदस्यों में तब्दील कर दिया। जब मकान में रहने वाले कम होते गये तो अब मकान बेंचने की नौबत आ गई।