युवा दम्पति का अपने बुजुर्गो के प्रति दायित्व
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इस उम्र में हर पति-पत्नी अपने सुख-दुःख आपस में बाँट लेतें हैं। कई बातें ऐसी होतीं हैं जिन्हें वे दूसरे किसी व्यक्ति से नहीं कह सकते, मसलन-यदि बेटे-बहू से कोई परेशानी हो, बेटी-दामाद से कोई परेशानी हो तो किससे कहेंगे? जीवन साथी से ही तो। लेकिन जीवन साथी ही न हो तो? वह यह बात किसी से नहीं कह पायेगा, नतीजा वह अन्दर ही अन्दर घुटेगा। जिससे वह चिड़चिड़ा हो जायेगा। जिसे युवा दम्पति पसंद नहीं करते। जरा अनुमान लगाइये जो बुजुर्ग दम्पति पैतीस-चालीस साल साथ रहकर एक-दूसरे से बिछुड़ जाये तो दूसरा कितना अकेला पन महसूस करता होगा?
ऊपर से युवा दम्पति का उससे यह उम्मीद करना कि वे घर के काम में हाथ बँटायेंगे, कुछ जिम्मेदारियां निभायेंगे, उसके लिए कितना कष्टकारी होता है कभी सोचकर देंखे।जिन्दगी भर तो उसने जिम्मेदारी ही तो निभाई है, जब उसके प्रति युवा दम्पति की जिम्मेदारी आ गई तो युवा दम्पति उसे बोझ समझने लगती है। वह अकेला ही घुटेगा किन अरमानों से अपने बच्चों को पाला होगा? अपने ही अरमानों को टूटता देख वह व्यक्ति कितना दुःखी होता है यह केवल वह अकेला व्यक्ति ही अनुभव कर सकता है।
अतः मेरा तो विचार है कि युवा दम्पति बुजुर्गो को बोझ न समझे वह भी तब जब वह अकेला हो, सहानुभूति और प्रेम रखे।
आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव
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