Tuesday, August 13, 2019

शहीदों की विरासत



पाई थी गुलामी शहीदों ने विरासत में,
बाजू उनके फड़फड़ा रहे थे,
आजाद भारत कराने को,
लोहा लेते अंग्रेजी शासन से थे।
यह देश हमारा है,
यह वतन हमारा है,
यह चमन हमारा है,
तू फैयाज़,
कहाँ से आ बैठा है?
अब हट यहाँ से,
यह प्यारा घर हमारा है,
हमें इसे प्यारा चमन बनाना है,
खो दिये प्राण शहीदों ने,
पर पीछे नहीं हटे,
शासक जितना दबाते थे,
उतना ही उठते जाते थे।
घबड़ा कर फैयाज़ भाग गया,
आजादी के परिन्दों से,
और शहीदों ने गुलामी को हराकर,
आजाद भारत विरासत में हमको दे दिया।।

गीता

मैं उसे अरसों से देखता आ रहा हूॅ छोटी थी तब से।अब २५ वर्ष की लगती है।पहले उसकी माँ घर बर्तन माँजने आया करती थी साथ में कभी-कभी वह भी आती थी।कुछ गन्दे कपड़ों में।अनपढ़-गँवार सी।लेकिन पढ़ने की ललक के साथ।जब भी आती हाथ में किताब रहती थी।माँ बर्तन माँजती वह किताब में मशगूल रहती।कभी-कभी किताब नहीं रहती तो मेरे ही घर का कोई पन्ना उठाकर पढ़ने लगती।नाम था"गीता"
माँ डाँटती रहती,"मेरे काम में हाथ बँटाओ।"
गीता कहती,"आती हूॅ बस थोड़ा सा और पढ़ना है।"फिर पढ़ने में मशगूल।
एक दिन मैंने उसकी माँ से कहा,"इसका पढ़ने का इतना ही मन है तो किसी स्कूल में नाम क्यों नहीं लिखा देती?"
उसकी माँ ने बताया,"बाबूजी, म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ती है।पढ़ने में बहुत तेज है।बस यही एक बुराई है इसमें जब देखो किताब से चिपकी रहती है।हालांकि घर का हर काम कर लेती है लेकिन पढ़ती ही रहती है।"
मैंने कहा,"यह तो अच्छी बात है।परेशानी किस बात की है?"
वह कहती,"बाबूजी, हम गरीब आदमी हैं इसे कितना पढ़ा पायेंगे यही सोचकर परेशानी होती है।"
मैंने उसकी मजबूरी समझी और चुप हो गया।समय अपनी गति से बढ़ता गया गीता अपनी गति से बड़ी होती गई।बहुत दिन बाद रास्ते में उसे बस्ता लेकर स्कूल जाते हुए देखा।उसने नमस्ते किया।
मैंने पूछा,"और बेटा,ठीक हो न?किस कक्षा में हो?"
वह बोली,"हाईस्कूल।"
मैंने कहा," बहुत अच्छा,पढ़ाई कैसी चल रही है?"
वह बोली,"फर्स्ट क्लास अंकल जी।"
उसकी स्पष्ट वादिता पर मैं अचम्भित रह गया।घर आया तो उसकी माँ बर्तन माँज रही थी।उसको मैंने गीता के बारे में बताया तो उसने कहा,"बाबूजी, क्या करें उसका पढ़ने का मन बहुत था सो हमने उसे पढ़ाना ही ठीक समझा।"
उसके कुछ दिनों बाद मेरी पत्नी ने उसका काम छुड़वा दिया।
फिर काफी दिन बाद एक दिन गीता की माँ मिठाई लेकर घर आई।बहुत खुश थी पत्नी से बोली,"बहू जी, आप लोग के आशिर्वाद से तथा बाबूजी की सीख से गीता कोई बड़ी अधिकारी बन गई है।आज मन्दिर हम लोग गये थे।यह प्रसाद है।
उस माँ की खुशी मैं देखता रह गया और मुझे गीता की मेहनत तथा लगन याद आने लगी।

प्रेम तथा अरेन्ज विवाह

आज-कल प्रेम विवाह सुनने बहुत आ रहा है।लड़के-लड़की एक साथ पढ़तें हों या काम करतें हों कभी-कभी प्रेम कर बैठतें हैं।अच्छा भी है प्रेम विवाह जहाँ वे एक-दूसरे को समझ लेतें हैं वहीं दहेज प्रथा पर रोक भी लगेगी।लेकिन यह प्रेम शारीरिक सुन्दरता पर भी हो सकता है जो क्षणिक होता है।शादी के छह महीने बाद शारीरिक सुन्दरता के प्रति मोह खत्म हो सकता है। जिन्दगी की डगर एक ही हो जाती है वही बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, राशन-पानी की चिन्ता करनी पड़ती है।
लव मैरिज करें खूब ठोंक बजा कर यह जिन्दगी का सवाल है।ऐसा न हो शारीरिक सुन्दरता में आप मन की सुन्दरता वाले जीवन साथी को खो बैंठे।आखिर प्रेमी युगल को समझना चाहिए कि फिल्मी नहीं असली जिन्दगी जीनी है।
अतः मैं तो कहूँगा कि अपनी पसंद के बारे में प्रेमी युगल अपने माँ-बाप को अवश्य अवगत करा दे।माँ-बाप जो भी करेंगे यह मानिए उचित करेंगे।आखिर बच्चों खुशी ही माँ-बाप की खुशी है।हो सकता है आपकी जवानी का जोश गलत जीवन साथी चुन बैठे पर माँ-बाप की अनुभवी तथा पैनी नजर अवश्य ही पहचान जायेगी।यदि आपकी पसंद अच्छी है तो माँ-बाप कभी मना नहीं करेंगे।माँ-बाप जो भी करतें हैं संतान की भलाई के लिए करतें हैं।
अब माँ-बाप का भी फर्ज बनता है कि यदि बच्चे ऐसी कोई बात बतायें तो ध्यान से सुनें।यह न सोचे कि उसने तो समझ ही लिया है हमें क्या समझना।दोनों को परखें कि संतान की पसंद आखिर कैसी है?अपनी नजर से उसे देंखे कि वह कैसा जीवन साथी होगा।यदि संतान द्वारा चुना गया जीवन साथी अच्छा नजर आये तो हामी भर दें अन्यथा स्पष्ट शब्दों में मना कर दें।आखिर यह संतान के भविष्य का प्रश्न है।