Saturday, August 24, 2019

मेरे हिन्दी के शिक्षक

मेरे हिन्दी के शिक्षक
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बात रहा हूॅ  ४३-४४ साल पहले की जब मैं इण्टर में पढ़ता था। मेरे हिन्दी के शिक्षक श्री रघुवंश मणि पाठक जी दुबले-पतले, एकहरा शरीर, लगभग पाँच फुट सात इंच लम्बे, चेहरा अण्डाकार हमेशा ही सफेद कपड़े पहनते थे। हिन्दी में डी लिट कर चुके थे। हालाँकि कि उनका चयन डिग्री कालेज में हो चुका था लेकिन पोस्टिंग होनी थी, सो पोस्टिंग होने तक हम लोगों को पढ़ाते रहे। हिन्दी के विद्वान थे ही सामाजिक ज्ञान भी उनका बहुत अच्छा था। प्रायः ही हम छात्रों को हिन्दी पढ़ाने के अलावा सामाजिक ज्ञान भी देते रहते थे। अब न जाने, हैं या नहीं,  मैं नहीं जानता। लेकिन ईश्वर से यही मनाता हूॅ कि उन्हें लम्बी उम्र दे क्योंकि उनकी जरूरत समाज को अब भी है। अभी ही नहीं हमेशा ही रहेगी।
आज मैं जो कुछ भी हूॅ उसमें उनका बहुत बड़ा योगदान है। हालाँकि मैं पढ़ने में सामान्य था। लेकिन उनकी बातें ध्यान से सुनता था। वे ऐसा पढ़ाते ही थे। कभी-कभी मैं अन्य विषय की कक्षा छोड़कर भाग जाता था। लेकिन उनकी कक्षा मैं नहीं छोड़ता था।क्योंकि हिन्दी के अतिरिक्त वे दुनिया दारी की बातें समझाते रहतें थे और मुझे हिन्दी कम दुनिया दारी की बातें अधिक अच्छी लगतीं थीं, अब भी लगतीं हैं।
उनकी बातें दिल में ऐसी बैठतीं कि यदि उन्हें अपनी जिन्दगी में प्रयोग करें तो जिन्दगी बन जाये।
अरे,
लगता है मैं राह भटक रहा हूॅ। शिक्षक महोदय की बात करते-करते अपनी बात करने लगा।
आइए,
उन्हीं की बात करता हूॅ।
एक दिन उन्होंने हम छात्रों से कहा, "एक सवाल करता हूॅ,  देखूँ उत्तर कौन दे पाता है? सवाल है कि, ईश्वर ने ऐसी कौन सी चीज बनाई है जो राजा या रंक सबको एक समान दी है? जो उसका जिस रूप में जितना प्रयोग करता है उतना ही वह उसी रूप में उपयोगी होता है।"
सभी छात्र चुप,  किसी को उत्तर समझ में नहीं आया, सभी सोचने लगे, कुछ छात्रों ने अपनी समझ से उत्तर भी दिया पर शिक्षक महोदय नकार गये।
लगभग दस मिनट प्रतीक्षा करवाने के बाद शिक्षक महोदय बोले, "मैं जानता हूॅ सवाल टेढ़ा है, इसलिए मैं खुद उत्तर देता हूॅ, उस चीज का जैसा जितना प्रयोग करोगे उतना ही वैसा बनोगे और वह चीज है...
                 
"एक दिन के चौबीस घण्टे"
           
न किसी को एक सेकेंड कम न एक सेकेंड अधिक, चाहो तो बनो चाहो तो बिगड़ो।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
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Friday, August 23, 2019

पागल कौन?


   पागल कौन?
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मैं सड़क पर जा रहा था,
देखा,
एक कम दिमाग का आदमी,
वह भी सड़क पर जा रहा था,
बिल्कुल चुपचाप देखा था उसको।
न किसी से बोल रहा था,
बिल्कुल बेफिक्र सा लगता था,
दुनिया से मतलब नहीं था,
लगता था उसका कोई दोस्त नहीं है।
धूप बहुत तेज थी उस दिन,
सूर्य देव भी कड़क रहे थे,
सबका बुरा हाल था उस दिन,
पसीना भी नहीं सूख रहा था।
लगता,
उसको प्यास लगी थी,
पर नल नहीं दिख रहा था,
चाय की एक दुकान खुली थी,
जब वह प्यास सह न पाया,
चाय की दुकान पर पहुंचा,
प्यास बुझाने को उसने,
पानी का एक मग उठाया।
दुकान वाला चिल्ला उठा तब,
"भागो भागो भाग यहाँ से,
साला पागल कहाॅ से आया,
मग यह गन्दा कर डालेगा।"
वह बेचारा मग को रखकर,
हट गया तुरन्त वहाॅ से,
पानी भी नहीं पी पाया था,
प्यासा ही रह गया बेचारा।
मैं यह सब देख रहा था,
शान्त भाव से रूक गया था,
जब वह मग को रख कर,
वहाँ से चलने को वापस हुआ।
मैंने देखा उस दुकानदार ने ही,
उस मग के पानी को,
उस पागल पर फेंक दिया था,
अब वह पागल गाली बकता,
दुकान वाला हँसने लगा था,
वहाँ जो भी बैठा था,
वह सब भी हँसने लगे थे।
तब मेरे कुछ समझ न आया,
आखिर पागल कौन यहाँ पर,
उसे कहूँ या इन्हें कहूँ,
दिमाग वाले होकर भी,
हम सब कितने पागल होंते हैं?

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शक

शक
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Doubt in relationship

मेरे एक परिचित हैं रघुनाथ प्रसाद जी, दूसरे ऑफिस में काम करते हैं। उनकी अपने सहकर्मी इन्द्रजीत से बहुत अच्छी दोस्ती थी, साथ ही खाते साथ ही पीते, घर से बाहर वे अधिकांशतः साथ ही दिखते थे, सुख हो या दुःख एक-दूसरे के हर मौके पर एक पैर खड़े रहते थे। पारिवारिक सम्बन्ध थे दोनों में।कोई पर्दा नहीं था चाहे बहू हो, बेटी हो या पत्नी हो, हम लोग उनकी घनिष्ठता का मिसाल देतें थे।
एक बार रघुनाथ जी की लड़की की शादी पड़ी, इन्द्रजीत तन-मन-धन से उनके साथ लगे रहे। वही नहीं, उनका परिवार भी लगा रहा। यहाँ तक कि यूं समझा जाये कि रघुनाथ जी ने शादी की आधी से अधिक जिम्मेदारी इस परिवार को दे रखी थी। यह परिवार भी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रहा था चाहे इन्द्रजीत हों या उनकी पत्नी या बच्चे सभी जी-जान से लगे थे। पूरा समाज इन्द्रजीत और उनके परिवार की वाह वाही कर रहा था। तारीफों के पुल बाँध रहा था। अपनी जिम्मेदारियों के अलावा भी इन्द्रजीत का परिवार जहाँ कोई कमी देखता उसे दूर करने के लिए खुद ही बिना कहे लग जाता जैसे अपनी बेटी-बहन की शादी हो।
शादी के छह महीने बाद इन्द्रजीत अचानक काफी बीमार पड़ गये। अब रघुनाथ जी बारी थी। ऑफिस से छुट्टी ले ली, इन्द्रजीत की सेवा में लग गये। कई रात अस्पताल में ही रूक गये। डॉक्टर को जो भी जरूरत पड़ती खुद निःस्वार्थ भाव से पूरी करते। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। लाख प्रयास के बाद भी इन्द्रजीत नहीं बचे। उनके परिवार पर पहाड़ गिर पड़ा।
रघुनाथ जी ने तो जैसे सगा भाई ही खो दिया, इन्द्रजीत के परिवार का भी बोझ रघुनाथ जी के ऊपर आ गया। उस परिवार को भी समय देने लगे। दिन भर में दो-तीन बार उस परिवार का हाल लेने जाने लगे।
रघुनाथ जी पत्नी को यह न सुहाता, इसी बीच इन्द्रजीत का लड़का इंजीनियरिंग करने लगा। रघुनाथ जी की पत्नी को शक हो गया कि, "हो न हो, रघुनाथ जी ही उसे पढ़ा रहें हैं।" हालांकि कि इन्द्रजीत की पत्नी मृतक कोटे में नौकरी पा चुकी थी। लेकिन पत्नी के शक का इलाज रघुनाथ नहीं कर सके। पत्नी से रोज ही झगड़ा होने लगा।
इन्द्रजीत का लड़का इंजीनियर बन गया तो उसने बहुत अच्छा सा मकान बनवा लिया। रघुनाथ की पत्नी ने शक किया कि जरूर उसके पति की मदद से बना है। निश्चित रूप से इन्द्रजीत की पत्नी और रघुनाथ के सम्बन्ध सीमा पार गये हैं। यह शक इतना गहरा होता गया कि एक दिन पत्नी ने रघुनाथ से खूब झगड़ा किया।रघुनाथ सफाई देते रहे लेकिन वह न मानी बोली, "आज से तुमको आजाद करती हूॅ, जाओ उस कुलटा के साथ मौज करो।"
इतना बड़ा और भद्दा आरोप रघुनाथ नहीं सह पाये। पत्नी को तमाचा मार दिया। पत्नी को भी गुस्सा आ गया।दूसरे कमरे में जाकर दरवाजा बन्द कर लिया। रघुनाथ डरे कहीं ऐसा-वैसा न कर बैठे। पड़ोसियों की मदद से दरवाजा तोड़कर अन्दर घुसे तो पत्नी को फाँसी का फंदा तैयार करते देखा। हाथ-पैर जोड़कर उसे रोका-मनाया।आइंदा इन्द्रजीत के घर कदम न रखने की कसमें खाई। तब जाकर पत्नी शान्त हुई।
रघुनाथ जी को अब महसूस हुआ कि एक शक का ऐसा भी अंत हो सकता है।

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