Monday, September 30, 2019

एक औरत ऐसी भी

एक औरत ऐसी भी
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Saas Bahu

वैसे तो औरतें जैसी भी हों, सीधी, समझदार, विनम्र, सहनशील आदि-आदि। लेकिन अधिकांशतः औरतों में एक आदत बुरी ही पाई जाती है, वे बातूनी बहुत होंती हैं और अपनी सास की शिकायत तो बढ़-चढ़ कर करतीं हैं। अधिकांश औरतें शादी के बाद स्वयं को और अपने मायके वालों को ससुराल पक्ष की अपेक्षा अच्छा समझतीं हैं।ससुराल पक्ष की हर छोटी-बड़ी शिकायत, जो टाली जा सकतीं हैं, किसी से कहें या न कहें अपनी माँ से जरूर कहतीं हैं।माँ भी उनकी हाँ में हाँ मिलाकर उनको ससुराल पक्ष के खिलाफ करतीं हैं।
लेकिन विमला जी ठीक इसके विपरीत हैं। अपनी सास या ससुराल पक्ष की कोई भी शिकायत किसी से नहीं करतीं हैं। यहाँ तक कि अपनी माँ या पति से भी नहीं।यदि कोई शिकायत रहती भी है, तो उसे उम्र का तकाजा मानकर टाल जातीं हैं। उनके दिमाग में यह बात हमेशा ही गूँजती रहती है कि वह इस घर की बहू हैं तो सास की ही वजह से हैं। न सास होतीं, न पति पैदा होता, यदि कोई दूसरी औरत अपने ससुराल पक्ष की शिकायत उनसे करती है तो यह कहकर चुप करा देतीं हैं कि,"यह तुम्हारी समस्या है, मैं सुनकर क्या करूँगी।"
इसीलिये वे जहाँ मुहल्ले के बड़े-बुजुर्ग की निगाह में भली रहतीं हैं, वहीं पुरूषों की पसंदीदा औरत हैं तथा औरतों की नजर में खटकतीं रहतीं हैं। लेकिन विमला जी इन सब की परवाह न करते हुए अपनी सास की सेवा करतीं हैं तथा ससुराल पर जान देती हैं। उनके एक लड़का और एक लड़की हैं। दोनों पर इसका असर पड़ता गया।
लड़की की शादी हो गई है। वह भी माँ से सीखे संस्कारों के कारण ही अपने ससुराल पक्ष की बड़ी कद्र करती है। यदि कभी भूल से भी वह विमला जी से कोई शिकायत कर देती है तो विमला जी उसकी पूरी बात सुनकर उसे समझाकर चुप करा देंती हैं ।ऐसा जतातीं हैं कि उसकी बातों को गौर से नहीं सुना। लेकिन शिकायत का हल शालीनता से खोज ही लेंती हैं।अधिकतर लड़की ही बात का बतंगड़ बनाते दिखती है, जिस पर वह बिना मोह-माया के लड़की को डाँट देती हैं। अब तो हालात यह है कि लड़की ससुराल पक्ष की कोई भी शिकायत नहीं करती।
समय पर उन्होंने लड़के की भी शादी कर दी। चूँकि लड़का जो देखता आया है अपनी पत्नी को वही सिखाता है। एक बार विमला जी बहुत बीमार पड़ गयीं। उधर उनकी लड़की की सास पहले से ही बीमार चल रहीं थीं। लड़की विमला जी मिलना चाहती है। लेकिन विमला जी की बहू ने यह कहकर उसे रोक दिया कि, "बीबी जी, आप अपनी सास को देखिये मैं अपनी सास को देख रहीं हूॅ।माँ जी इतना नहीं बीमार हैंं कि उन्हें देखने आपको आना पड़े।हाँ, जब ऐसी हालत आयेगी आपको खबर कर दिया जाएगा।"
विमला जी ने यह बातें सुन ली अपनी बहू को गले लगा कर कहा,"मुझे ऐसी ही बहू चाहिए थी, मैं बहुत खुश किस्मत हूॅ।"

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
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Sunday, September 29, 2019

                 बच्चों को संस्कार दें अहंकार नहीं
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राकेश धर त्रिपाठी बजी एक धनाढ्य व्यक्ति हैं।लक्ष्मी उन पर कृपा बनाये रखती है सो घर में सबकुछ है।स्वयं,पत्नी कामना,पुत्र वैभव और पुत्री लाली यही उनका परिवार है।त्रिपाठी जी के माता-पिता भी साथ ही रहते हैं।त्रिपाठी जी माँ-बाप को जी-जान से चाहते हैं।माँ-बाप के भक्त हैं।पत्नी कामना उन्हें इसीलिये श्रवण कुमार कहती है।अब आप या मैं खुद इसे पत्नी का ताना ही कह सकतें हैं।लेकिन त्रिपाठी जी पर पत्नी के इस ताने का कोई असर नहीं पड़ता है।ऐसा नहीं कामना सास-ससुर का अपमान करती है।ध्यान बहुत रखती है उनका।
दोनों बच्चे बड़े होते गये।कमाने भी लगे।वैभव डाॅक्टर है तो लाली इंजीनियर।लेकिन अहंकार तो दूर-दूर तक नहीं है दोनों में।ठीक पिता की तरह विनम्र हैं दोनों।सीनियर्स हो जूनियर्स सभी से प्रेम से ही बोलते हैं।त्रिपाठी जी और उनकी पत्नी अधेड़ होने लगे सो वैभव की शादी करनी चाही।लेकिन वैभव तैयार न था।कहता,"पहले लाली की शादी करिये।"
आखिर हार कर त्रिपाठी जी ने  लाली की शादी कर डाली। इत्तेफाक कहिए या कुछ भी।कामना और लाली की सास को एक बार एक ही साथ दिल का दौरा पड़ा।लाली असमंजस में थी किसे देखूँ माँ को या सास को।दोनों को सेवा की जरूरत थी।त्रिपाठी जी और वैभव से पूछा तो एक ही उत्तर मिला,"तुम्हें यहाँ आने की कोई जरूरत नहीं।अपनी सास को देखो।यहाँ हम लोग हैं।जब सास ठीक हो जायें तो आकर माँ को देख जाना।"

Tuesday, September 24, 2019

वह बेनाम रह गया

वह बेनाम रह गया
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lal bahadur Shatri ji


मैंने बहुत सपूत देंखे हैं,
किस-किस का मैं नाम गिनाऊँ,
सबके होते रहतें हैं किस्से,
और आतें हैं याद।
कुछ सपूत ऐसे भी आये,
बिना नाम के रह गये,
लोगों ने उन्हें भुलाया,
वे बेनाम रह गये।
एक छोटा सा दुबला-पतला,
बिल्कुल साधारण गरीब सा,
न साधु न सन्यासी था,
बिल्कुल मामूली आदमी था।
दो अक्टूबर को दुनिया में आया,
पर बड़े नाम में खो गया,
वह भी मेरा ही सपूत था,
बिना नाम के रह गया।
उसने दुश्मन को औकात दिखाई,
दूर जो दुश्मन के साथ खड़े थे,
उनको भी ऑख दिखा दी,
बोला,
"अपना बोयेंगे अपना खायेंगे,
तुझसे हम कुछ न लेंगे,
अब तो,
"जय जवान जय किसान"
हमको कहना ही है।

पर हाय रे मेरी किस्मत,
तू क्यों रूठ गई थी,
उसे बिना समय दिये ही,
मुझसे क्यों छीन लिया है?
अब तो कोई उसे याद नहीं करता,
शायद नाम याद न होगा,
"जय जवान जय किसान"
फिर कैसे याद रहेगा,
तब फिर क्यों मैं नाम बताऊँ,
मेरा सपूत आखिर वह कौन था?

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
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