Monday, November 11, 2019

बुढ़ापा (जीवन का अन्तिम पड़ाव)


 बुढ़ापा (जीवन का अन्तिम पड़ाव)
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old age photo

यह मेरा अन्तिम पड़ाव है,
बेवश और लाचार हो जाता,
बच्चों का खिलौना होकर,
बड़ों पर बोझ बन जाता हूॅ।
यहीं मेरे इतिहास के पन्ने,
खुद ब खुद खुलने लगते हैं,
अब तक का बहीखाता,
अब दिखने लगता है।
नफा और नुकसान अब,
दिमाग में आने लगते हैं,
बच्चे मुझसे खेलने लगते हैं,
बड़े तंग आ जाते हैं।
कभी हरा-भरा पेड़ था,
अब सूखकर ठूंठ हो गया हूॅ।
न जाने कब पककर टूट पड़ूगां,
सोचकर परेशान होता हूॅ
कभी-कभी खुद से कहता हूॅ,
हे भगवान्,
मुझे उठा ले,
अब सह न पाऊँगा।
यमराज के साथ जाने लगता हूॅ,
घूम-घूम कर देखता हूॅ,
क्या साथ ले जा रहा,
क्या छोड़कर आया हूॅ ।
दूर अर्थी दिख जाती है,
चार ही कंधों पर रहता हूॅ,
कहीं भीड़ बहुत अधिक,
कहीं गिने-चुने ही रहते हैं।
तब समझ में आता है,
मैं कुछ भी कर देता,
चार ही कंधे मिलने थे,।
लेकिन मेरे नाम के पीछे,
कितनी दुनिया भाग रही है,
बस मैंने यही कमाया,
और,
यही छोड़कर आया हूॅ।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
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Friday, November 8, 2019

घर वापसी

घर वापसी
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Saas Bahu
किरण को और अधिक सहना भारी पड़ रहा था। घर है कि कबाड़खाना, जब देखो काम-काम बस काम ही काम, राजेश को कार्यशाला आठ बजे पहुंचना होता है, कार्यशाला भी घर से साठ किलोमीटर दूर है और बस से जातें हैं राजेश सो सुबह साढ़े पाँच ही बजे उठना पड़ता है किरण को, राजेश को तैयार करके ऑफिस भेजना उसके बाद    दो साल की बिटिया उठ जाती है। उसे देखना, फिर सत्तर-बहत्तर साल के सास-ससुर को देखना। नाश्ता-पानी भोजन आदि-आदि। चूंकि सास-ससुर बूढ़े हैं मदद तो करतें नहीं ऊपर से उनके साथ कुछ न कुछ लगा ही रहता है।  दो साल की बेटी के साथ भी कुछ न कुछ लगा ही रहता है। परिवार में पाँच व्यक्ति हैं, राजेश,
सास ससुर, बिटिया और खुद किरण। पाँचों का खान-पान अलग-अलग समय अलग-अलग, किरण ने राजेश से अलग होने को कई बार कहा पर राजेश कहतें, माँ-बाप की उम्र देखती हो कि नहीं? उन्हें छोड़कर कैसे अलग हो जाऊँ?"
आखिर एक दिन ऐसा भी आया कि किरण ने सास-ससुर के लिए कुछ भी करना बन्द कर दिया। वे बेचारे खुद बनाने-खाने लगे। किरण झांकने भी नहीं जाती। राजेश ने किरण को टोंकना शुरू किया। जब किरण पर कोई असर नहीं पड़ा तो एक दिन एक तमाचा जड़ दिया।
किरण को अपने मायके पर बड़ा गर्व था। गुस्से में मायके आ गई। यहाँ पर सभी ने राजेश को न देखकर उससे उसके बारे में पूछना शुरू किया। किरण ने सही-सही बता दिया। किरण के पिताजी बोले, "अभी इसी वक्त जैसे आई हो वापस चली जाओ अपने घर।क्या तुम सास-ससुर की सेवा नहीं करोगी? आखिर तुम्हारे भाइयों की बीवियों को हमारी देख-रेख करनी होगी या नहीं? या तुमको देखेंगी?  एक बात तो याद रखना राजेश के बिना इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है न तो ससुराल वालों से बिगाड़ रखकर।"

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Wednesday, November 6, 2019

विमला बहन जी

विमला बहन जी

My teacher

बात कर रहा हूॅ जब मैं कक्षा पाँच में पढ़ता था। लड़कों के लिए विद्यालय में सीट नहीं खाली थी अतः पिताजी ने मेरा नाम लड़कियों के साथ लिखा दिया था। मैं विद्यालय में लड़कियों के साथ बैठता, जिसके कारण मेरे अन्दर एक हीन भावना आ गई थी। लड़के भी चिढ़ाते, "20 लड़कियों में एक लड़का नाक कटाने आया है।" जो मेरी हीन भावना को और बढ़ाने के लिए बहुत था। मैं लड़कों से बोल नहीं पाता था और लड़कियों को दोस्त नहीं बना पाता था। मैं उस समय पढ़ने में बहुत अच्छा था हमेशा ही अच्छे नम्बरों से पास होता था, बाद में संगति बिगड़ी और मैं बिगड़ा।
मैं ध्यान देता विमला बहनजी मुझ पर मेहरबान रहतीं थीं तो बहुत कड़क मिजाज की विद्यालय के जिस रास्ते से गुजरतीं हल्ला हो जाता, "विमला बहनजी आ रहीं है।" हर लड़का या लड़की दुबक जातें थें,ec सन्नाटा और केवल सन्नाटा ही रहता था।
एक दिन चपरासी ने मुझे बताया कि, "तुम्हें विमला बहनजी ने बुलाया है।" सुनते ही मुझे काटो तो खून नहीं लेकिन जाना तो पड़ा ही विमला बहनजी की बात जो थी, मैंने कांपते पैरों से उनके कमरे का दरवाजा खोला बोला, "मे आई कम इन मैडम?"
उन्होंने रोबीली आवाज में कहा, "यस कम इन।"
मैं कमरे घुसा, उन्होंने सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "मैं तुम्हारी हीन भावना को अच्छी तरह समझती हूॅ पर विद्या का कोई स्थान नहीं होता चाहे तुम लड़कियों के बीच बैठो या लड़कों के बीच. विद्या समान ही रहेगी. बदलती हैं तो दिमागी दशा. तुम एक अच्छे विद्यार्थी हो मन लगाकर पढ़ो मुझे तुमसे आशा है।
उनकी बातें मन को लगीं मैं विद्यालय में प्रथम आया, नाम दूसरे विद्यालय में लिख गया।
काश,
विमला बहन जी फिर मिल जातीं।


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