Friday, November 15, 2019

ढकोसला

ढकोसला
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श्याम लाल जी यों तो ५६  साल के हैं और पेशे से व्यापारी, उनका व्यापार भी खूब चलता है, सो अपने बड़े बेटे को अपना सहयोगी बना लिया है। स्वभाव से भी बहुत अच्छे हैं। जिससे उनके व्यवहारिक भी बहुत अधिक हैं। सभी रिश्तेदारों तथा जान-पहचान वालों को बाँधें रहतें हैं। कोई उनकी मौसी का लड़का है तो कोई मामी का, कोई गाँव का पाटीदार है तो कोई गाँव का चौकीदार, कहने का आशय सभी से मेल-व्यवहार बनाकर रखतें हैं। हैं तो सर्वाहारी। किसी चीज से परहेज नहीं करते। यहाँ तक कि अपने परिवार में हर शादी के बाद मांसाहार पार्टी करतें हैं।
लेकिन एक बिमारी से बहुत ग्रस्त रहतें हैं बेचारे, मौके पर धार्मिक बन जातें हैं। कोई कार्य करने से पहले पंडित जी से मुहूर्त निकलवातें हैं। व्यापार पर कब जाना उचित रहेगा? किस दिशा की ओर मुंह करके जाना उचित रहेग? आज दिशा-शूल है कि नहीं? कहीं शादी पड़ी जाये तो पंडित जी मुहूर्तों की लाइन लगा देते हैं। लाख बेइज्जती हो जाये परन्तु काम मुहूर्त पर ही करेंगे, उनकी लड़की की गोद भराई (Engagement) थी। पंडित जी ने कहा, "लड़के वालों के आने का मुहूर्त  ११:०० बजे हैं और गोद भराई का मुहूर्त  ३:०० से ६:०० बजे तक और आप (लड़की वालों) लोगों को वहाँ ४:०० बजे पहुंच जाना चाहिए। वह पंडित जी पर इतना विश्वास करतें हैं या मुहूर्त से डरते हैं कि लड़के वालों को तो ११.०० बजे होटल में बुला लिया खुद आये ४:०० बजे, अब सोचिए लड़के वाले कितने पक गए होंगे? उसके कितने मेहमान बिना नाश्ता-भोजन किये ही भूखे वापस चले गए। लड़के के बाप झल्ला कर रह गए लेकिन श्याम लाल जी मुहूर्त से मजबूर थे। मुहूर्त उन पर इस कदर हावी रहतें हैं कि मांसाहार पार्टी का भी मुहूर्त निकलवातें हैं और पंडित जी निकाल भी देतें हैं। साथ में शराब पीने का मुहूर्त भी निकाल लेतें हैं।
ऐसा नहीं कि यह मुहूर्त-बिमारी केवल श्याम लाल जी को ही हो उनके पूरे परिवार को है।
लड़की दूसरे के घर ब्याह गयी जो यह सब नहीं मानता, उस पर भी मुहूर्त-बिमारी है। कोई भी काम करना होगा सास-ससुर से नहीं पूछेगी अपने माँ-बाप से कहकर पंडित जी से निकलवायेगी, फिर तो सास-ससुर ही क्या ब्रह्मा भी कहें तब भी वह माँ-बाप के द्वारा बताए गए मुहूर्त पर ही काम करेगी। श्याम लाल जी के लड़की के घर में इस हस्तक्षेप का यह असर पड़ा कि सास-ससुर हों या ससुराल का कोई सदस्य कोई उसके बीच में बोलता ही नहीं कौन अपनी बेइज्जती कराये। क्योंकि वह वही करेगी जैसा उसके माँ-बाप बतायेंगे।नतीजा-धीरे धीरे ससुराल वालों से उसकी दूरी बढ़ने लगी। सास-ससुर तो उसके बीच में वैसे भी नहीं बोलतें लेकिन जब कभी अपने बेटे को मुहूर्त-बिमारी से ग्रस्त होते देखतें हैं तो उसे टोक देतें हैं परन्तु बेटा भी क्या करे बेचारा जब पत्नी और उसके माँ-बाप मुहूर्त-बिमारी से बुरी तरह ग्रस्त हैं।

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Wednesday, November 13, 2019

बिटिया रानी

बिटिया रानी 
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daugther father

कमलेन्द्र जी ने नीलू को बहुत प्यार और अरमानों से बड़ा किया था, करतें भी क्यों न नीलू उनकी अकेली संतान जो ठहरी। पत्नी नीलू के बचपन में ही स्वर्ग सिधार गयीं थीं। कमलेन्द्र ही उसके सब कुछ थे। माँ-बाप भाई-बहन सब, अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाई, अच्छे से अच्छे कपड़े पहनाते, नीलू की तबीयत जरा सी खराब होती बेचारे परेशान हो जाते, किसी भी चीज की मांग नीलू की जिद में बदलती उससे पहले वह सामान हाजिर हो जाता। दिन बीते  नीलू बड़ी होती गई लेकिन कमलेन्द्र जी का दिमाग उसके प्रति नहीं बदला, उनकी निगाह में नीलू बच्ची रहती, नतीजतन नीलू जिद्दी होती गयी, जहाँ कहती,"पापा, यह सामान चाहिए।"
पापा दौड़ पड़ते बाजार की तरफ, कमलेन्द्र जी की एक बहन थी। वह समझाती,"कमल, नीलू को इतना दिमाग मत चढ़ाओ, कभी शादी करोगे इसकी, तब क्या लड़के वाले इसके नखड़े उठायेंगे? सोचो।"
परन्तु कमलेन्द्र केवल एक हँसी में बातों में उड़ा देते। कहते,"दीदी, नीलू के आदमी को घर जंवाई बना लूंगा पर नीलू को अपने से अलग नहीं करूंगा।"
बहन उनकी बातों पर हँस कर रह जाती, कहती, "मेरा काम तुम्हें समझाना था समझा दिया, आगे तुम जानो और तुम्हारा काम।"
कमलेन्द्र पुराने रवैये पर अड़े रहे,  नीलू दिन प्रतिदिन जिद्दी होती गयी, उसके सपनों को भी पंख लग गये, अतः थोड़ी अभिमानी हो गई।
कमलेन्द्र जी ने बहुत कोशिश की उसकी शादी करने की लेकिन नतीजा फिस्स। नीलू को कोई लड़का पसंद नहीं आता, सभी लड़कों में कमी निकाल देती। परिणामस्वरूप नीलू  45 साल के उम्र में भी क्वांरी ही रह गई।

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Monday, November 11, 2019

बुढ़ापा (जीवन का अन्तिम पड़ाव)


 बुढ़ापा (जीवन का अन्तिम पड़ाव)
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old age photo

यह मेरा अन्तिम पड़ाव है,
बेवश और लाचार हो जाता,
बच्चों का खिलौना होकर,
बड़ों पर बोझ बन जाता हूॅ।
यहीं मेरे इतिहास के पन्ने,
खुद ब खुद खुलने लगते हैं,
अब तक का बहीखाता,
अब दिखने लगता है।
नफा और नुकसान अब,
दिमाग में आने लगते हैं,
बच्चे मुझसे खेलने लगते हैं,
बड़े तंग आ जाते हैं।
कभी हरा-भरा पेड़ था,
अब सूखकर ठूंठ हो गया हूॅ।
न जाने कब पककर टूट पड़ूगां,
सोचकर परेशान होता हूॅ
कभी-कभी खुद से कहता हूॅ,
हे भगवान्,
मुझे उठा ले,
अब सह न पाऊँगा।
यमराज के साथ जाने लगता हूॅ,
घूम-घूम कर देखता हूॅ,
क्या साथ ले जा रहा,
क्या छोड़कर आया हूॅ ।
दूर अर्थी दिख जाती है,
चार ही कंधों पर रहता हूॅ,
कहीं भीड़ बहुत अधिक,
कहीं गिने-चुने ही रहते हैं।
तब समझ में आता है,
मैं कुछ भी कर देता,
चार ही कंधे मिलने थे,।
लेकिन मेरे नाम के पीछे,
कितनी दुनिया भाग रही है,
बस मैंने यही कमाया,
और,
यही छोड़कर आया हूॅ।

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