Sunday, August 25, 2019

युवा दम्पति का अपने बुजुर्गो के प्रति दायित्व

युवा दम्पति का अपने बुजुर्गो के प्रति दायित्व
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Old Age

अगर देखा जाये तो बहुत कम पति-पत्नी ६०-६५ साल के बाद एक साथ रह पातें हैं नहीं तो अधिकांश पति-पत्नी में कोई न कोई साथ छोड़ देता है। दूसरा शेष जीवन अकेले ही सफर करता है। यह वह उम्र होती है जब पति-पत्नी को एक-दूसरे की सबसे अधिक जरूरत रहती है। जवानी तो बच्चों की देखभाल, पढ़ाने-लिखाने मे, रिश्तेदारियां निभाने में बीत जाती है। इस उम्र में हर व्यक्ति पिछली जिन्दगी का लेखा-जोखा देखने के साथ-साथ वर्तमान शान्ति मय चाहता है। जिसमें बीते जीवन की गलतियों का अफसोस करता है, और वर्तमान जीवन में अपनों का प्यार चाहता है।
इस उम्र में हर पति-पत्नी अपने सुख-दुःख आपस में बाँट लेतें हैं। कई बातें ऐसी होतीं हैं जिन्हें वे दूसरे किसी व्यक्ति से नहीं कह सकते, मसलन-यदि बेटे-बहू से कोई परेशानी हो, बेटी-दामाद से कोई परेशानी हो तो किससे कहेंगे? जीवन साथी से ही तो। लेकिन जीवन साथी ही न हो तो? वह यह बात किसी से नहीं कह पायेगा, नतीजा वह अन्दर ही अन्दर घुटेगा। जिससे वह चिड़चिड़ा हो जायेगा। जिसे युवा दम्पति पसंद नहीं करते। जरा अनुमान लगाइये जो बुजुर्ग दम्पति पैतीस-चालीस साल साथ रहकर एक-दूसरे से बिछुड़ जाये तो दूसरा कितना अकेला पन महसूस करता होगा?
ऊपर से युवा दम्पति का उससे यह उम्मीद करना कि वे घर के काम में हाथ बँटायेंगे, कुछ जिम्मेदारियां निभायेंगे, उसके लिए कितना कष्टकारी होता है कभी सोचकर देंखे।जिन्दगी भर तो उसने जिम्मेदारी ही तो निभाई है, जब उसके प्रति युवा दम्पति की जिम्मेदारी आ गई तो युवा दम्पति उसे बोझ समझने लगती है। वह अकेला ही घुटेगा किन अरमानों से अपने बच्चों को पाला होगा? अपने ही अरमानों को टूटता देख वह व्यक्ति कितना दुःखी होता है यह केवल वह अकेला व्यक्ति ही अनुभव कर सकता है।
अतः मेरा तो विचार है कि युवा दम्पति बुजुर्गो को बोझ न समझे वह भी तब जब वह अकेला हो, सहानुभूति और प्रेम रखे।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
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Saturday, August 24, 2019

     गिरते हैं क्यों लोग
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ऊपर उठतें हैं लोग वही,
जो ऊँचा देखतें हैं,
गिरतें हैं लोग वही,
जो धरा छोड़ देतें हैं।
नजर रहे मंजिल पर,
मिल ही जायेगी,
गर जमीं भूले तो,
भटक जाओगे।
जाना कहीं था,
कहीं आ जाओगे,
अगर रास्ता भूले तो,
खो जाओगे।
मुश्किल बहुत है सफर जिन्दगी का,
चलना है कंटीली राहों पर,
काँटे चुभेंगे ठोकरें लगेंगी,
जो हार गये तो,
न कहीं के रहोगे।
हौसला बुलंद कर तू ऐ राही,
निकल चल कँटीली राहों पर,
हिम्मत न हार राहों से,
ऊँचाई की सोच,
पर,
नजर धरा पर रहे,
तो,
कोई शक नहीं,
ऊँचाइयां छू लोगे तुम।

मेरे हिन्दी के शिक्षक

मेरे हिन्दी के शिक्षक
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बात रहा हूॅ  ४३-४४ साल पहले की जब मैं इण्टर में पढ़ता था। मेरे हिन्दी के शिक्षक श्री रघुवंश मणि पाठक जी दुबले-पतले, एकहरा शरीर, लगभग पाँच फुट सात इंच लम्बे, चेहरा अण्डाकार हमेशा ही सफेद कपड़े पहनते थे। हिन्दी में डी लिट कर चुके थे। हालाँकि कि उनका चयन डिग्री कालेज में हो चुका था लेकिन पोस्टिंग होनी थी, सो पोस्टिंग होने तक हम लोगों को पढ़ाते रहे। हिन्दी के विद्वान थे ही सामाजिक ज्ञान भी उनका बहुत अच्छा था। प्रायः ही हम छात्रों को हिन्दी पढ़ाने के अलावा सामाजिक ज्ञान भी देते रहते थे। अब न जाने, हैं या नहीं,  मैं नहीं जानता। लेकिन ईश्वर से यही मनाता हूॅ कि उन्हें लम्बी उम्र दे क्योंकि उनकी जरूरत समाज को अब भी है। अभी ही नहीं हमेशा ही रहेगी।
आज मैं जो कुछ भी हूॅ उसमें उनका बहुत बड़ा योगदान है। हालाँकि मैं पढ़ने में सामान्य था। लेकिन उनकी बातें ध्यान से सुनता था। वे ऐसा पढ़ाते ही थे। कभी-कभी मैं अन्य विषय की कक्षा छोड़कर भाग जाता था। लेकिन उनकी कक्षा मैं नहीं छोड़ता था।क्योंकि हिन्दी के अतिरिक्त वे दुनिया दारी की बातें समझाते रहतें थे और मुझे हिन्दी कम दुनिया दारी की बातें अधिक अच्छी लगतीं थीं, अब भी लगतीं हैं।
उनकी बातें दिल में ऐसी बैठतीं कि यदि उन्हें अपनी जिन्दगी में प्रयोग करें तो जिन्दगी बन जाये।
अरे,
लगता है मैं राह भटक रहा हूॅ। शिक्षक महोदय की बात करते-करते अपनी बात करने लगा।
आइए,
उन्हीं की बात करता हूॅ।
एक दिन उन्होंने हम छात्रों से कहा, "एक सवाल करता हूॅ,  देखूँ उत्तर कौन दे पाता है? सवाल है कि, ईश्वर ने ऐसी कौन सी चीज बनाई है जो राजा या रंक सबको एक समान दी है? जो उसका जिस रूप में जितना प्रयोग करता है उतना ही वह उसी रूप में उपयोगी होता है।"
सभी छात्र चुप,  किसी को उत्तर समझ में नहीं आया, सभी सोचने लगे, कुछ छात्रों ने अपनी समझ से उत्तर भी दिया पर शिक्षक महोदय नकार गये।
लगभग दस मिनट प्रतीक्षा करवाने के बाद शिक्षक महोदय बोले, "मैं जानता हूॅ सवाल टेढ़ा है, इसलिए मैं खुद उत्तर देता हूॅ, उस चीज का जैसा जितना प्रयोग करोगे उतना ही वैसा बनोगे और वह चीज है...
                 
"एक दिन के चौबीस घण्टे"
           
न किसी को एक सेकेंड कम न एक सेकेंड अधिक, चाहो तो बनो चाहो तो बिगड़ो।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
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