Tuesday, November 17, 2020

Thursday, August 13, 2020

Friday, June 5, 2020



दिन बीतते गये आज के जमाने में दो बहुएं सास-ससुर के साथ एक साथ प्यार से रह जायें आश्चर्य जनक है न? संतोष जी की बहुएं भी जमाने से अलग नहीं हैं, सो दोनों में किसी न किसी बात पर खटपट होती रहती है। कभी एक बहू अपने कमरे को धोती तो पानी बहकर दूसरे के कमरे में आ जाता है तब दोनों बहुओं में कहा-सुनी हो जाती है।कभी एक बहू का बच्चा दूसरी बहू के कमरे में गन्दा कर देता है तो दोनों बहुओं में  खटपट हो जाती है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों पर दोनो बहुएं प्रायः लड़ने लगतीं हैं। धीरे-धीरे उनमें बोलचाल बन्द हो गयी। दोनों को शिकायत रहती है कि, "माँ जी, मेरे पक्ष में कुछ नहीं बोलतीं। "इसी शिकायत के चलते दोनों ने संतोष जी की पत्नी से बोलना छोड़ दिया। खटपट यहाँ तक पहुंच गयी कि दोनो लड़कों ने आपस में बोलना छोड़ दिया, फिर बात बढ़ी तो दोनों ने अलग अलग चूल्हे जला लिए।संतोष जी और उनकी पत्नी ने  दोनों लड़कों तथा बहुओं को खूब समझता लेकिन उनके समझ में कुछ न आया।दोनों लड़कों में तय हुआ कि माँ बड़े के साथ खायेगी और संतोष जी छोटे के साथ, संतोष जी ने सुना तो पत्नी से बोले,"हमने तो दोनों को कभी बाँटा नहीं फिर उन्होंने हम दोनों को क्यों बाँट लिया, नहीं हम दोनों नहीं बँटेंगे, अपना भोजन खुद बनायेंगे।"
इस तरह एक ही छत के नीचे एक परिवार तीन परिवारों में बँट गया। होली का त्यौहार आने वाला है सभी खरीदारी करने में लगे हुए हैं। संतोष जी के लड़कों ने अन्य सामानों के साथ-साथ कमरों के दरवाजे तथा खिड़कियों के लिए मोटे लम्बे और खूबसूरत परदे खरीदे। संतोष जी ने परदों को देखा तो उनकी खूब तारीफ की और अन्त में बोले, "इनसे अच्छे नजर ,जुबान और प्रेम के परदे होते हैं जिनके आगे सब परदे बेकार हैं।"
सुनकर दोनों लड़के तथा उनकी पत्नियां एक-दूसरे को देखने लगे जबकि संतोष जी की आवाज में एक दर्द छुपा हुआ था।

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आप ठहरे देवता और जमाना दूसरे मिजाज का है।"
राम लाल जी रिटायर हो गए।मनोज की भी शादी हो गयी।
किन्तु उसकी पत्नी तेज निकली।राम लाल जी पत्नी से उसकी नहीं बनती थी।सो पत्नी के कारण वह माँ-बाप को अपने पास न रख सका।अतः राम लाल जी ने रिटायरमेन्ट के बाद ऑफिस से मिले पैसों से एक छोटा सा मकान बनवा लिया।जिन्दगी शान्ति से गुजर रही थी कि  राम लाल जी की पत्नी  का देहांत हो गया।राम लाल जी अकेले पड़ गये।मनोज के पास रहने लगे तो मनोज की पत्नी को राम लाल जी और अपने बच्चों को संभालना भारी हो गया।इसलिए राम लाल सुनीता के पास रहने लगे।लेकिन कितने दिन रहते?सुनीता के पति और ससुराल वालों को खटकने लगे अतः अब बेचारे अकेले ही रहतें हैं।भोजन-पानी के लिए एक नौकर लगा रखा है।

Wednesday, January 29, 2020

                                पिता
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राम लाल जी सरकारी मुलाजिम थे।दुनिया की छल-कपट और लल्लो-चप्पो से दूर एक सीधे-सादे इंसान।पत्नी और दो बच्चों,एक लड़का मनोज तथा लड़की सुनीता, के साथ रहते हैं।ऊपरी कमाई की कुर्सी पर बैठ कर भी ईमानदारी से नौकरी की।कभी अपनी नीयत नहीं खराब की पैसे के प्रति।इसलिए कार्यालय में अधिकारियों तथा कर्मचारियों में अच्छी छवि के बावजूद उन्नति न कर सके।क्योंकि इसके लिए तेज-तर्रार चलता-फिरता होना आवश्यक था जबकि राम लाल जी ठहरे एक सीधे-सादे आदमी अपने काम से काम रखने वाले आदमी।
बैंक से लोन लेकर मनोज को एमबीबीएस करवाया।पैसे तो सुनीता की शादी के लिए रखे हुए थे सो सुनीता की शादी अपने दम पर की।मनोज डाॅक्टर बन गया।उन्हें तथा उनकी पत्नी को बड़ा गर्व होता जब मनोज कहता,"पापा-मम्मी रिटायरमेन्ट बाद आप लोग मेरे पास रहियेगा।पापा यह जमाना आप जैसों के लिए नहीं है।आप ठहरे देवता और जमाना दूसरे मिजाज का है।"
राम लाल जी रिटायर हो गए।मनोज की भी शादी हो गयी।
किन्तु उसकी पत्नी तेज निकली।राम लाल जी पत्नी से उसकी नहीं बनती थी।सो पत्नी के कारण वह माँ-बाप को अपने पास न रख सका।अतः राम लाल जी ने रिटायरमेन्ट के बाद ऑफिस से मिले पैसों से एक छोटा सा मकान बनवा लिया।जिन्दगी शान्ति से गुजर रही थी कि  राम लाल जी की पत्नी  का देहांत हो गया।राम लाल जी अकेले पड़ गये।मनोज के पास रहने लगे तो मनोज की पत्नी को राम लाल जी और अपने बच्चों को संभालना भारी हो गया।इसलिए राम लाल सुनीता के पास रहने लगे।लेकिन कितने दिन रहते?सुनीता के पति और ससुराल वालों को खटकने लगे अतः अब बेचारे अकेले ही रहतें हैं।भोजन-पानी के लिए एक नौकर लगा रखा है।

Lauchora

Monday, January 27, 2020

परदे

परदे
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Parda

सन्तोष कुमार पीडब्ल्यूडी में अवर अभियंता हैं। बेहद ईमानदार हैं ऊपरी कमाई से तो दूर से हाथ जोड़तें हैं, सहकर्मी उनका मजाक भी उड़ातें हैं, उन्हें "हरिश्चंद्र" कहतें हैं। लेकिन संतोष जी पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।सोचतें है कि, "ऊपरी कमाई पाप होती है।"
पत्नी भी सीधी-सादी है, संतोष जी के परिवार में कुल चार ही लोग हैं वे खुद, पत्नी और दो लड़के। दोनों लड़के शादी योग्य हो चुके हैं जबकि संतोष जी रिटायरमेन्ट योग्य, पत्नी से संतोष जी अक्सर कहतें रहते हैं, "दोनों बच्चों को हम लोगों ने कितनी परेशानियों से पढ़ाया-लिखाया और बड़ा किया है, हम दोनों ही जानतें हैं, मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे बच्चे मुझसे दो कदम आगे निकलें।मैं रिटायर होने वाला हूॅ, बस फिर जी भरकर आराम करूँगा, हमें क्या करना है कभी बड़े के पास रहेंगे तो कभी छोटे के पास, बस जिन्दगी आराम से गुजर जायेगी।"
इत्तेफाक से उनके दोनों लड़के उनके शहर में ही इंजीनियर हो गये। उनके साथ ही रहने लगे, संतोष जी को अपने सपने पूरे होते दिखने लगे। लड़के भी माँ-बाप का ध्यान रखने लगे। समय के साथ-साथ संतोष जी ने दोनो लड़कों की शादी कर दी। बहुएं आयीं चूँकि संतोष जी आजाद ख्याल के आदमी हैं अतः बहुओं से परदा नहीं करवाते हैं, उनका मानना है कि नजर और जुबान से बड़ा कोई परदा नहीं होता।
दिन बीतते गये आज के जमाने में दो बहुएं सास-ससुर के साथ एक साथ प्यार से रह जायें आश्चर्य जनक है न? संतोष जी की बहुएं भी जमाने से अलग नहीं हैं, सो दोनों में किसी न किसी बात पर खटपट होती रहती है। कभी एक बहू अपने कमरे को धोती तो पानी बहकर दूसरे के कमरे में आ जाता है तब दोनों बहुओं में कहा-सुनी हो जाती है।कभी एक बहू का बच्चा दूसरी बहू के कमरे में गन्दा कर देता है तो दोनों बहुओं में  खटपट हो जाती है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों पर दोनो बहुएं प्रायः लड़ने लगतीं हैं। धीरे-धीरे उनमें बोलचाल बन्द हो गयी। दोनों को शिकायत रहती है कि, "माँ जी, मेरे पक्ष में कुछ नहीं बोलतीं। "इसी शिकायत के चलते दोनों ने संतोष जी की पत्नी से बोलना छोड़ दिया। खटपट यहाँ तक पहुंच गयी कि दोनो लड़कों ने आपस में बोलना छोड़ दिया, फिर बात बढ़ी तो दोनों ने अलग अलग चूल्हे जला लिए।संतोष जी और उनकी पत्नी ने  दोनों लड़कों तथा बहुओं को खूब समझता लेकिन उनके समझ में कुछ न आया।दोनों लड़कों में तय हुआ कि माँ बड़े के साथ खायेगी और संतोष जी छोटे के साथ, संतोष जी ने सुना तो पत्नी से बोले,"हमने तो दोनों को कभी बाँटा नहीं फिर उन्होंने हम दोनों को क्यों बाँट लिया, नहीं हम दोनों नहीं बँटेंगे, अपना भोजन खुद बनायेंगे।"
इस तरह एक ही छत के नीचे एक परिवार तीन परिवारों में बँट गया। होली का त्यौहार आने वाला है सभी खरीदारी करने में लगे हुए हैं। संतोष जी के लड़कों ने अन्य सामानों के साथ-साथ कमरों के दरवाजे तथा खिड़कियों के लिए मोटे लम्बे और खूबसूरत परदे खरीदे। संतोष जी ने परदों को देखा तो उनकी खूब तारीफ की और अन्त में बोले, "इनसे अच्छे नजर ,जुबान और प्रेम के परदे होते हैं जिनके आगे सब परदे बेकार हैं।"
सुनकर दोनों लड़के तथा उनकी पत्नियां एक-दूसरे को देखने लगे जबकि संतोष जी की आवाज में एक दर्द छुपा हुआ था।


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Sunday, January 26, 2020

            

Thursday, January 23, 2020

भारत और मोदी

भारत और मोदी
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Modi and Bharat mata



यह भारत देश हमारा,
सारे जग से न्यारा है,
सभी धर्मों का समावेश यहाँ पर,
सभी को समान अधिकार मिला है,
इसीलिए तो भारत,

"माता"

कहलाता है।
मोदी जी की अगुवाई में,
उन्नति के मार्ग पर चल पड़ा है,
भारत में जो न हुआ कभी भी,
अब वह भी होने लगा है।
विश्व गुरु बनने की राह भी,
अब तो प्रशस्त हुई है,
जो सपना देखा भारत ने,
अब पूरा होने को है।
बस,
यही विनती है भारत की जनता से,
मोदी जी के हाथों को मजबूती दे,
और,
भारत को ऊँचाइयाँ छूने दे।

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Monday, January 20, 2020

                   माँ-बाप
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माँ-बाप इन दो शब्दों में ब्रम्हांड है माँ त्याग है तो बाप अनुशासन है।बाप अनुशासन सिखाता है तो माँ त्याग।जीवन के संघर्ष में दोनों का अलग-अलग महत्व है।बाप कभी-कभी मारता है तो सन्तान के लिए वह दुश्मन स्वरुप होता है लेकिन यदि देखा जायं तो यही मार जीवन-मार्ग पर चलना सिख्ती है।बाप दुश्मन होकर भी सबसे बड़ा मित्र होता है जिसे महत्व नहीं दिया जाता है।सच मानिए बाप बच्चों को मारता है तो बच्चे से अधिक कष्ट उसे ही होता है।लेकिन क्या अजीब विडम्बना है कि बड़े होकर बच्चे दोनो को भार समझने लगतें हैं।उन्हें पिछली पीढ़ी का समझने लगतें हैं लेकिन बच्चों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे पिछली पीढ़ी के ही सही लेकिन अनुभवी होतें हैं।अतः मैं तो कहूँगा कि उनका निरादर करने के बजाय बच्चों को उनके अनुभव का फायदा उठाना चाहिए।

Saturday, January 18, 2020

                       मेल
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आज के जमाने में शादी हो जाने के बाद दो भाई मेल से रहें आश्चर्यजनक है न?लेकिन आनंद बाबू और उनके भाई ठीक इसके विपरीत हैं।आनंद जी सीधे-सादे नौकरीपेशा साधारण पुरूष हैं उनके भाई गांव में खेतीबाड़ी का कार्य करते हैं।चूँकि गांव में पढ़ाई-लिखाई की अच्छी व्यवस्था नहीं है।अतः भाई के दोनों लड़कों और एक लड़की को आनंद जी ने शहर में अपने पास रखा।अपनी ही संतानों की तरह उन्हें पढ़ाया-लिखाया।उनका सारा खर्च आनंद जी ही उठातें हैं।भाई केवल खेतीबाड़ी करता है।अपने और आनंद जी के परिवार के लिए राशन की व्यवस्था वही करता है।दोनों घरों के अन्य खर्च आनंद जी उठाते हैं।अभी हाल ही में तो भाई की लड़की की शादी हुई है सारा खर्च आनंद जी ने ही तो उठाया था।भाई ने मेहमानों के भोजन-पानी की व्यवस्था की थी।इसीप्रकार आनंद जी के परिवार में कोई अवसर आता है तो भाई ही आनंद जी के सारे मेहमानों के भोजन की व्यवस्था करता है जबकि आनंद जी अन्य खर्च उठाते हैं।
      भाई के दोनों लड़कों को पढ़ा-लिखा कर उनके सरकारी अधिकारी बनने तक उनका पूरा खर्च आनंद जी ने ही तो उठाया है बिना किसी भेदभाव के।भाइयों के इस मेल की चर्चा दूर-दूर तक होती है और मिसाल दी जाती है।

Friday, January 17, 2020

साठ के ऊपर दम्पति

साठ के ऊपर दम्पति 
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old Age


पागलपन भी कैसा है यह, 
तुम बिन हम रह नहीं सकते, 
जीवन-संघर्ष किया है साथ तुम्हारे, 
रहेंगे भी तुम बिन हम कैसे?
जब जवां हम दोनों थे, 
वह समय भी याद है हमको, 
संघर्षरत जब हम दोनों थे,
अब तो तुम्हारा साथ  मिला है।
यह उम्र भी कितनी अजीब है, 
जवानी का संघर्ष बिता कर, 
फुर्सत से फिर हम दोनों हैं,
उड़ने का मन करता है, 
गर तुम साथ रहो तो।
अहोभाग्य मेरा है यह तो, 
तुम अब भी मेरे साथ खड़े हो, 
साथ जियें अब साथ मरें हम,
बस यही इच्छा है अब तो।।

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Tuesday, December 24, 2019

बड़ा कौन

बड़ा कौन
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three Brothers

राम बाबू और श्याम बाबू दोनों भाइयों में बहुत घनिष्ठता थी, घनिष्ठता होती भी क्यों न? दोनों बहुत बड़े व्यापारी थे, धनाढ्य और हर सुख-संपत्ति से संपन्न, हर सुख में एक-दूसरे का साथ देने वाले, दोनों ही अपने तीसरे भाई कन्हैया बाबू को हीन भावना से देखते थे। किस्मत के मारे कन्हैया बाबू न तो धनाढ्य थे न ही सुख-संपत्ति से संपन्न थे। जहाँ एक ओर राम बाबू तथा श्याम बाबू के दो-दो लड़के थे वहीं कन्हैया बाबू के तीन लड़कियां थी। कन्हैया बाबू नौकरी-पेशे वाले थे, साधारण रहन-सहन था उनका, राम बाबू और श्याम बाबू हमेशा ही कहते रहते थे कि कन्हैया को कंधा देने वाला कोई नहीं है। कन्हैया सुनकर दुःखी रहते थे लेकिन उत्तर नहीं देते थे, अतः भाइयों से कुछ दूरी बनाकर ही रहते थे।
राम बाबू और श्याम बाबू की पहुंच भी ऊँचे-ऊँचे तबके तक थी। किन्तु कन्हैया बाबू ने इसका फायदा न उठाना ही बेहतर समझा न ही राम तथा श्याम बाबू उनकी कोई मदद ही करते थे। बेचारे कन्हैया बाबू कम में ही सन्तुष्ट रहते थे।
एक बार श्याम बाबू बहुत बीमार पड़े।राम बाबू के पास इतना समय नहीं था कि उनकी बीमारी में काम आते, केवल मोबाइल पर ही हाल-चाल ले लेते थे। किन्तु कन्हैया बाबू तथा उनके परिवार ने श्याम बाबू की देखभाल में दिन-रात एक कर दिया, तन-मन-धन से उनकी देखभाल में लग रहे, आखिर मेहनत रंग लाई, श्याम बाबू ठीक हो गये तो कन्हैया बाबू को गले लगाते हुए बोले,"धन से बहुत लोग बड़े होते हैं मगर दिल से बड़ा होना कोई तुमसे सीखे।"

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Thursday, December 5, 2019

नारद मुनि का काम-वेदना से पीड़ित होना

       नारद मुनि का काम-वेदना से पीड़ित होना
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Narad Muni


एक बार नारद मुनि ने हिमालय की एक गुफा में घोर तपस्या की, इन्द्र डरे कि नारद मेरा सिंहासन लेना चाहते हैं (क्योंकि देवताओं में सबसे परेशान और डरपोक इन्द्र ही हैं।सिंहासन के लिए हमेशा परेशान रहतें हैं और सिंहासन पर कभी किसी असुर का तो कभी साधु पुरूष का खतरा बना रहता है।) तुरन्त कामदेव और बसन्त को नारद की तपस्या भंग करने का आदेश दे डाला।
बहुत कोशिश के बाद भी किसी प्रकार कामदेव और बसन्त नारद की तपस्या भंग नहीं कर सके वापस चले गये, इधर तपस्या पूरी होने पर नारद जागे तो उन्हें यह घमण्ड हो गया कि, "मैंने काम पर विजय पा ली है।"
किन्तु यह नहीं जानते थे कि उसी स्थान पर भगवान् शंकर ने कामदेव को अपनी तीसरी ऑख से भस्म कर दिया था तथा रति व देवताओं की विनती पर कामदेव को पुनः जीवित भी कर दिया था लेकिन यह भी कहा कि,"इस जगह से जितनी दूर तक नजर जायेगी कामदेव निष्क्रिय रहेंगे"
जिसके कारण ही नारद पर कामदेव का वश नहीं चला और नारद ने समझ लिया, "मैंने काम पर विजय प्राप्त कर ली है।"
उन्होंने भगवान् शंकर को यह बात बताई। भगवान् शंकर ने कहा, "नारद, यह बात किसी और से मत कहना खासकर भगवान् विष्णु से।"लेकिन नारद घमण्ड में चूर कहाॅ मानने वाले थे, अतः ब्रह्मा तथा विष्णु से भी यह बात बता दी। तब भगवान् शंकर ने नारद को लीला से वशीभूत कर दिया। उधर विष्णु ने नारद के मार्ग पर एक शहर की रचना कर डाली। शहर का राजा शीलनिधि को बनाया और उसकी पुत्री श्रीमती का स्वयंवर  रचाया। नारद ने जब श्रीमती को देखा उनमें कामवासना पैदा हो गई, सोचने लगे, "किस उपाय से श्रीमती को प्राप्त करूँ चूँकि नारियां सुन्दरता पसंद करतीं हैं इसलिए भगवान् विष्णु का रूप लेना उचित होगा।"
सोचकर उन्होंने भगवान् विष्णु से उनका रूप मांगा, नारद को कामवासना से ग्रस्त देख कर विष्णु ने उन्हें सबक सिखाना चाहा तथा रूप अपना देकर मुंह वानर का दे दिया। नारद खुशी-खुशी स्वयंबर में गये। श्रीमती ने उनके वानर मुंह पर घास तक नहीं डाली। जब कि अन्य लोगों को नारद का मुनि रूप ही दिखा।।
सभा में भगवान् शंकर के दो गण नारद की रक्षा के लिए मौजूद थे। नारद के वानर रूप को वे जानते थे। इधर भगवान् विष्णु अदृश्य रूप में सभा में आये और श्रीमती को ब्याह ले गये, तो शंकर के गणों ने नारद से कहा,"मुनिवर, आइने में अपना मुंह तो देख लीजिये वानर जैसा है।"
नारद ने जब आइने में खुद को देखा तो बहुत दुःखी और क्रोधित हुए। शिव गणों को श्राप दे दिया कि, "तुम दोनों ब्राह्मण की ही संतान होगे लेकिन राक्षस।"
भगवान् विष्णु को श्राप दिया कि, "जिस प्रकार तुमने स्त्री के लिए मुझे तड़पाया है तुम नारी के वेश में सबको छलते हो, असुरों को नारी के वेश में ही विष पान करवाया, भस्मासुर को नारी वेश में ही भस्म किया, जाओ मैं श्राप देता हूॅ कि वैसे ही स्त्री वियोग में तुम भी तड़पोगे।तुमने मुझे वानर का रूप दिया है न तो यही वानर तुम्हारे सहायक होंगे।"

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Wednesday, December 4, 2019

               यही जमाना है
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शान्ति देवी का परिवार छोटा ही है।पति-पत्नी और दो लड़के बस।बदकिस्मती रही उनकी कि पति का स्वर्ग वास रिटायर होते ही हो गया।अब खुद व दोनों नौकरी पेशा वाले लड़के ही बचे।पति अपना मकान भी नहीं बनवा पाये थे।शान्ति देवी ने सोचा अब मुझे क्या करना है।दो लड़के हैं दोनों के पास रहूंगी कुछ दिन बड़े के पास तो कुछ दिन छोटे के पास ।लड़कों की भी यही इच्छा थी।माँ को लड़के जी-जान से चाहते थे।दिन हँसी-खुशी बीत रहे थे।इस बीच शांति देवी ने बड़े लड़के की शादी कर दी।बहू जो आई तेज-तर्रार।सो शान्ति देवी की उससे नहीं पटी।कुछ दिनों बाद छोटे लड़के की भी शादी कर दी।उसकी भी बहू तेज-तर्रार निकली।परिवार में बहुओं का राज्य हो गया।लड़के बहुओं से दबते थे।उनके आगे कुछ बोल नहीं पाते थे और बहुओं को शान्ति देवी पसन्द नहीं थीं।एक दिन बहुओं की राय से दोनों लड़कों ने शान्ति देवी को वृद्धाश्रम में डाल दिया।शान्ति देवी आसमान से जमीन पर आ गिरीं।क्या सोचा था क्या हो गया    !बेचारी शान्ति देवी जी

दरिंदगी से कैसे बचाऊँगा?

दरिंदगी से कैसे बचाऊँगा?
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Studing GIrl


तेरी खामोश निगाहों में,
जहाँ का आसमाँ खोजता हूॅ,
नजर आता नहीं कुछ भी,
एक खाली बंजर भूमि नजर आती है।
यह क्या लिखती है पगली,
मेरी प्यारी मेरी चाँद का टुकड़ा,
"मेरा भारत महान है",
उनके लिए,
जो नेताओं के प्यारे हैं,
या,
जिनके पास पैसों की खनक प्यारी है।
हम गरीब हैं,
समाज से निकाले हुए टुकड़े,
बदबूदार और कई दिन पुराने टुकड़े,
नये टुकड़े में हजार कमियां निकाल देती है यह दुनिया,
फिर हमारी गुजर कैसे और कहाँ होगी इस दुनिया में।
तुझे तो गिद्धों की नजर से बचाना होगा मुझको,
साँप-बिच्छू रेंग हैं यहाँ पग-पग पर,
और भी कई जहरीले जीवों की नजरें गड़ेंगी तुझ पर,
मैं बेवश किस-किस की ऑखें फोड़ूगाँ?

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Sunday, December 1, 2019

इन्सान क्या है

इन्सान क्या है

Priyanka Reddy



इन्सान क्या है? एक जानवर ही तो है। अगर इसे जानवर से भी गया-गुजरा कहा जाये तो अतिश्योक्ति न होगी, जानवर भी कच्ची उम्र की मादा से सम्पर्क नहीं बनाता और इन्सान कामातुर होकर यह सब नहीं देखता, उसे तो बस हवस मिटानी होती है आखिर आसिफा आदि काण्ड क्या सिद्ध करतें हैं। एक नर जानवर जब एक मादा जानवर का प्रयोग कर लेता है तो दूसरा नर जानवर उसका प्रयोग नहीं करता किन्तु इन्सान यह सब नहीं देखता, कामांध मादा जानवर का ही नर जानवर प्रयोग करता है परन्तु इन्सान यह सब नहीं देखता उसे तो बस हवस मिटानी होती है। हाल ही में हुआ हैदराबाद काण्ड यही सिद्ध करता है। इन बलात्कारियों की सजा एक है,  जैसे को तैसा। लेकिन जिस कानून में बलात्कारियों को भी बचाव के लिए वकील मिलता हो वहाॅ यह सम्भव नहीं, इसका एक ही उपाय है उस वकील को भी जैसे को तैसा।

Saturday, November 23, 2019

जमाना बहुत बुरा आया है

जमाना बहुत बुरा आया है
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Broken family

जमाना बहुत बुरा आया है,
भाई को हम भाई नहीं मानते,
माँ-बाप की इज्ज़त नहीं करते,
इन प्यारे रिश्ते को तोड़कर,
गैरों को अपना लेते हैं।
और कहतें हैं,
मेरा व्यवहार बहुत है,
समाज में मेरा नाम बहुत है।
हमसे अच्छी मेरी पत्नी है,
अपने बाप को बाप समझती,
अपनी माँ को माँ समझती,
और भाई को भाई मानती,
हमको भी मजबूर कर देती,
यह तो अच्छी बात है,
हम ऐसा ही करतें हैं,
इन सबकी इज्ज़त करतें हैं,
क्योंकि ये इज्ज़त के लायक हैं।
पर हम क्यों भूल जातें हैं,
मेरा भाई मेरा भाई है,
वह दुश्मन नहीं हो सकता,
आखिर मेरा ही खून है,
मेरे माँ-बाप घर के कचरे नहीं हैं,
क्योंकि ये पूज्यनीय हैं।
जब भी  समाज पूछेगा हमसे,
हमको कहना ही पड़ेगा,
यह मेरा ही भाई है,
और ये ही मेरे माँ-बाप हैं,
यह बिल्कुल ही सत्य है,
यही पहचान है मेरी।
इसके बावजूद भी हम,
कितने मूर्ख होतें हैं,
भाई को दुश्मन मानकर,
माँ-बाप को कचरा समझकर,
सोचतें हैं मेरे बेटे बड़े होकर,
मेरी सेवा करेंगे।।
        मूर्ख

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Thursday, November 21, 2019

                   यही बनारस है
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जी हाँ,
भगवान् शिव के त्रिशूल पर टिकी,शेष नाग के फन पर बसी यही गलियों और मन्दिरों की नगरी काशी है।काशी यानी बनारस वरूणा तथा अस्सी नदियों के बीच की नगरी वाराणसी।धर्म का अवलम्ब,हिन्दू संस्कृति की पहचान है।गलियों में बनी बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं को देखकर आप अचम्भित रह जायेंगे जिन गलियों में साइकिल बाइक मुश्किल हो उनमें बड़ी वाहनों से अट्टालिकाओं के लिए सामान लाना आश्चर्य जनक है।कई किलोमीटर तक गंगा किनारे पक्के घाटों का होना आश्चर्य में डाल देता है।काशी की सुबह शिव शंकर से शुरू होती है।सैलानिओं की भीड़ देखते ही बनती है।सबका मकसद एक "हिन्दू संस्कृति का अध्ययन"
यहाँ श्मशान घाट हैं एक,"हरिश्चंद्र घाट"दूसरा "मणिकर्णिका घाट"।

Tuesday, November 19, 2019

                    एकाकी जीवन
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 मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।एकाकी जीवन कैसा होता है उसे तब पता चलता है जब वह एकान्त वास में पड़ता है।तब वह समझ सकता है एकांत वास कैसा होता है।जब उसके पास कोई काम न हो जब बात करने वाला भी कोई न हो।वह अकेला हो एक दम अकेला।जी हाँ बात कर रहा हूॅ अपनी।घर में हूॅ।पहले  18 सदस्यों का परिवार था।ईश्वर की माया कहें या कोप पाँच ही सदस्य परिवार में हैं इस समय।जिसमें से भी दो सदस्य अस्पताल में हैं एक बिमारी के कारण भर्ती हैं दूसरा उनके सहायक के रूप में रहता है।छोटा भाई ड्यूटो पर तो भतीजा घर अस्पताल एक किये रहता है।अब घर में बचें तीन सदस्य।दो औरतें एक मैं खुद।न बोलने वाला कोई न चालने वाला कोई घर में अकेला बैंठे-बैंठे अब समझने लगा हूॅ अकेलापन कैसा होता है।

Monday, November 18, 2019

             टूटता-बिखरता परिवार
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भगवान् भी एक हँसते-बोलते परिवार को कैसे बिखेर देता है।देखिए तो।श्यामा नन्द जी ने दस कमरे का मकान बनवाया।उनके परिवार में उनकी माँ,चार लड़के,उनकी बहुएं,चार पोते और एक पोती यानि कुल  18 सदस्यों वाला बड़ा परिवार था।सोचा,"सभी मिलकर रहेंगे।"लेकिन भगवान् को कुछ और ही मंजूर था।पहले माँ गिरीं कमर की हड्डी टूट गई।दों साल बिस्तर पर रहने के बाद स्वर्ग सिधार गयीं।
फिर बड़ा पोता अंजानी बिमारी से मर गया।अभी उसका गम भूले नहीं थे कि दूसरे नम्बर का पोता भी उसी बिमारी से मर गया।उनके बड़े लड़के ने दौड़-धूप कर अपनी बेटी की शादी कर डाली।शादी के कुछ ही दिन बाद सबसे छोटी बहू कैंसर से मर गयी।जिसके कुछ दिनों के बाद पत्नी ने बुढ़ापे के कारण दम तोड़ दिया।फिर बड़े लड़के और उसकी पत्नी ने कैंसर के कारण अन्तिम साँसें ले लीं।बेचारे अभी गम भूले भी न थे कि खुद  92 साल की उम्र में स्वर्ग सिधार गये।
तीसरा लड़का बाहर रहता है।उसके दो लड़के भी बाहर नौकरी करतें हैं।सबसे छोटा पोता भी बाहर ही रहता हैं।दूसरे नम्बर का बेटा भी शरीर में इन्फेक्शन के कारण चलता बना।इस समय उनके दस कमरे के मकान में सिर्फ चार ही लोग रहतें हैंं।
यह माया है भगवान की कि  18 सदस्यों के परिवार वाले मकान को चार सदस्यों में तब्दील कर दिया। जब मकान में रहने वाले कम होते गये तो अब मकान बेंचने की नौबत आ गई।

Friday, November 15, 2019

ढकोसला

ढकोसला
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श्याम लाल जी यों तो ५६  साल के हैं और पेशे से व्यापारी, उनका व्यापार भी खूब चलता है, सो अपने बड़े बेटे को अपना सहयोगी बना लिया है। स्वभाव से भी बहुत अच्छे हैं। जिससे उनके व्यवहारिक भी बहुत अधिक हैं। सभी रिश्तेदारों तथा जान-पहचान वालों को बाँधें रहतें हैं। कोई उनकी मौसी का लड़का है तो कोई मामी का, कोई गाँव का पाटीदार है तो कोई गाँव का चौकीदार, कहने का आशय सभी से मेल-व्यवहार बनाकर रखतें हैं। हैं तो सर्वाहारी। किसी चीज से परहेज नहीं करते। यहाँ तक कि अपने परिवार में हर शादी के बाद मांसाहार पार्टी करतें हैं।
लेकिन एक बिमारी से बहुत ग्रस्त रहतें हैं बेचारे, मौके पर धार्मिक बन जातें हैं। कोई कार्य करने से पहले पंडित जी से मुहूर्त निकलवातें हैं। व्यापार पर कब जाना उचित रहेगा? किस दिशा की ओर मुंह करके जाना उचित रहेग? आज दिशा-शूल है कि नहीं? कहीं शादी पड़ी जाये तो पंडित जी मुहूर्तों की लाइन लगा देते हैं। लाख बेइज्जती हो जाये परन्तु काम मुहूर्त पर ही करेंगे, उनकी लड़की की गोद भराई (Engagement) थी। पंडित जी ने कहा, "लड़के वालों के आने का मुहूर्त  ११:०० बजे हैं और गोद भराई का मुहूर्त  ३:०० से ६:०० बजे तक और आप (लड़की वालों) लोगों को वहाँ ४:०० बजे पहुंच जाना चाहिए। वह पंडित जी पर इतना विश्वास करतें हैं या मुहूर्त से डरते हैं कि लड़के वालों को तो ११.०० बजे होटल में बुला लिया खुद आये ४:०० बजे, अब सोचिए लड़के वाले कितने पक गए होंगे? उसके कितने मेहमान बिना नाश्ता-भोजन किये ही भूखे वापस चले गए। लड़के के बाप झल्ला कर रह गए लेकिन श्याम लाल जी मुहूर्त से मजबूर थे। मुहूर्त उन पर इस कदर हावी रहतें हैं कि मांसाहार पार्टी का भी मुहूर्त निकलवातें हैं और पंडित जी निकाल भी देतें हैं। साथ में शराब पीने का मुहूर्त भी निकाल लेतें हैं।
ऐसा नहीं कि यह मुहूर्त-बिमारी केवल श्याम लाल जी को ही हो उनके पूरे परिवार को है।
लड़की दूसरे के घर ब्याह गयी जो यह सब नहीं मानता, उस पर भी मुहूर्त-बिमारी है। कोई भी काम करना होगा सास-ससुर से नहीं पूछेगी अपने माँ-बाप से कहकर पंडित जी से निकलवायेगी, फिर तो सास-ससुर ही क्या ब्रह्मा भी कहें तब भी वह माँ-बाप के द्वारा बताए गए मुहूर्त पर ही काम करेगी। श्याम लाल जी के लड़की के घर में इस हस्तक्षेप का यह असर पड़ा कि सास-ससुर हों या ससुराल का कोई सदस्य कोई उसके बीच में बोलता ही नहीं कौन अपनी बेइज्जती कराये। क्योंकि वह वही करेगी जैसा उसके माँ-बाप बतायेंगे।नतीजा-धीरे धीरे ससुराल वालों से उसकी दूरी बढ़ने लगी। सास-ससुर तो उसके बीच में वैसे भी नहीं बोलतें लेकिन जब कभी अपने बेटे को मुहूर्त-बिमारी से ग्रस्त होते देखतें हैं तो उसे टोक देतें हैं परन्तु बेटा भी क्या करे बेचारा जब पत्नी और उसके माँ-बाप मुहूर्त-बिमारी से बुरी तरह ग्रस्त हैं।

आज के लिए इतना ही...धन्यवाद
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया कमेंट और शेयर करें... सुधीर श्रीवास्तव

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